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________________ और साधुत्व ये सब साधुजन का भव विनाशक लक्षण है। उपर्युक्त श्लोक में 'गुरु' शब्द आया है, गुरुशब्द का वाच्य धर्मगुरु, दीक्षागुरु, विद्यागुरु, मातापित्रादि अनेक हैं किन्तु प्रकृति सन्दर्भ में धर्मगुरु विवक्षित हैं । उस गुरु का लक्षण सूक्तिमुक्तावलिग्रंथ के अधोलिखित श्लोक में उल्लिखित है अवद्यमुक्ते पथि यः प्रवर्तते प्रवर्तयत्यन्यजनं च निस्पृहः स एव सेव्यः स्वहितैषिणा गुरुः स्वयं तरंस्तारयितुं क्षमः परम् ॥ भावार्थ - निर्दुष्ट (मोक्ष) मार्ग में स्वयं चलनेवाला, निस्पृह होकर अन्यजनों को भी उस मार्ग में चलानेवाला, भव समुद्र का पार करनेवाला और दूसरों को पार कराने में समर्थ ऐसा जो गुरु है वह आत्माहितैषी को पूज्य है । रात्रि के समय निर्जन प्रदेश में योगारूढ़ जो योगी है उसको देखकरके एक मित्र अपने मित्र से पूछता है कि " इसको भय क्यों नहीं है" तब वह जवाब देता है कि "धैर्यं यस्य पिता क्षमा च जननी शान्तिश्चिरं गेहिनी । सत्यं सूनुरयं दया च भगिनी भ्राता मनस्संयमः ॥ शय्या भूमितलं दिशोपि वसनं ज्ञानामृतं भोजनं । एते यस्य कुटुम्बिनो वद सखे कस्माद्भयं योगिनः ॥ "" भावार्थ - जिस योगी का धैर्य ही पिता है, क्षमा ही जननी है, शान्ति ही पत्नी है, सत्य ही पुत्र है, दया ही भगिनी है, मनस्संयम ही सहोदर है, भूतल ही शय्या है, दिशायें ही वस्त्र है, ज्ञानामृत ही भोजन है ऐसे कुटुम्बवाले योगी को भय किससे ? मित्र कहो । अधोलिखित दृष्टान्तों से भी व्यक्त होता है कि निर्विकारी जातरूपधारी और मुमुक्षु जो परम तपस्वी हैं उसकी दिगम्बर मुद्रा सर्वोत्कृष्ट तथा पूज्य है । ऋक्संहिता में उल्लेख है कि "मुनयो वातवसनाः यहाँ पर वात शब्द का अर्थ पवन और वसन शब्द का अर्थ वस्त्र है अर्थात् बातवसन शब्द का अर्थ दिगम्बर मुनि है । नारद परिव्राजकोपनिषत् में कहा गया है " आशानिवृत्तो भूत्वा आशाम्बरधरो भूत्वा" यहाँ पर " आशाम्बर" शब्द का अर्थ "दिगम्बर " है । मैत्रेयोपनिषत् अध्याय ३ कारिका १६ में कहा गया है कि‘“देशकालविमुक्तोऽस्मि दिगम्बरमुखेऽस्महं" इसका भाव यह है कि मैं देशकाल नियम का त्यागी और दिगम्बरावस्था मुख को अनुभव करने वाला हूँ । इससे दिगम्बरावस्था वैष्ट्रिय स्पष्ट होता है। योगवासिष्ट में कहा है कि के नाहं रामो न मे वाञ्छा भावेषु न च मे मनः । Jain Education International -- "" शान्तिमास्थातुमिच्छामि स्वात्मन्येव जिनो यथा ॥ भावार्थ- मैं राम नहीं हूँ, मुझे इच्छा नहीं है, भोगोपभोग सामग्रियों में मेरा चित्त आसक्त नहीं है, मैं मेरी आत्मा में ही, जिनदेव की भांति, शान्तिस्थापना करना चाहता हूँ । जिनदेव दिगम्बर रहते हैं, उन जिनदेव की भांति रामचन्द्र भी स्वात्मा में शांति स्थापना करने को चाहते हैं, इससे सिद्ध होता है कि दिगम्बर - जिनमुद्रा सर्वोत्कृष्ट तथा पूज्य है । दत्तात्रेय सहस्रनामस्थित अधोलिखित श्लोक से मालूम पड़ता है कि दत्तात्रेय दिगम्बर-योगी थे। 44 'दत्तात्रेयो महायोगी योगीशश्चामरप्रभुः । निर्दिगम्बरो बालो मायामुक्तो दयापरः ॥" भावार्थ - दत्तात्रेय महायोगी, योगीश्वर, अमरनायक, | मुनि दिगम्बर, बाल मायारहित और दयापर थे। महाकवि भर्तृहरि ने वैराग्य शतक में कहा है कि एकाकी नि:स्पृहः शान्तः पाणिपात्रो दिगम्बरः । कदा शम्भो भविष्यामि कर्मनिर्मूलनक्षमः ॥ भावार्थ - हे शम्भो ! मैं अकेला, इच्छारहित, शान्त, पाणिपात्र, दिगम्बर और कर्म निर्मूलन करने में समर्थ कब होऊँगा ? इस उक्ति से ज्ञात होता है कि दिगम्बरावस्था सर्वोत्कृष्ट तथा परमपवित्र है । यह बात प्रसिद्ध है कि भागवतकर्ता शुकमुनि और महादेव दिगम्बर रहते थे । उपर्युक्त इन सब उदाहरणों से भी सुस्पष्ट विदित होता है कि परम तपस्वी की दिगम्बर मुद्रा सवोत्कृष्ट और पूज्य है, अतः जानना चाहिये कि जो परम वीतरागी जातरूपधारी निर्विकारी और परमशान्त दिगम्बर महर्षि हैं उनकी निन्दा करना अश्रेयस्कर है और उनकी भक्ति करना श्रेयस्कर है। " कुतः श्रेयोऽतिचर्चिनाम् ?" 'हितेच्छु' वीर सं. २४७३ से साभार जरूर सुनें सन्त शिरोमणि आचार्यरत्न श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के आध्यात्मिक एवं सारगर्भित प्रवचनों का प्रसारण 'साधना चैनल' पर प्रतिदिन रात्रि 9.30 से 10.00 बजे तक किया जा रहा है, अवश्य सुनें । नोट: यदि आपके शहर में ' साधना चैनल' न आता हो तो कृपया मोबाइल नं. 09312214382 पर अवश्य सूचित करें। For Private & Personal Use Only •अप्रैल 2005 जिनभाषित 17 www.jainelibrary.org
SR No.524295
Book TitleJinabhashita 2005 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2005
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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