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________________ से होगा। हैं और उसी की प्राप्ति के लिए चलते हैं। इसलिए महावीर | जिस व्यक्ति के वर्तमान में अच्छे कदम नहीं उठ रहे उसका भगवान का दर्शन ज्ञेय पदार्थों को महत्व नहीं देता अपितु | | भविष्य अंधकारमय होगा ही। कोई चोरी करता रहे और ज्ञान को महत्व देता है। ज्ञेय पदार्थों से प्रभावित होने वाला पूछे कि मेरा भविष्य क्या है? तो भैया वर्तमान में चोरी करने वर्तमान भौतिकवाद भले ही आध्यात्म की चर्चा कर ले वालों का भविष्य क्या जेल में व्यतीत नहीं होगा यह एक किन्तु अध्यात्म को प्राप्त नहीं कर सकता। ज्ञेयतत्व का छोटा सा बच्चा भी जानता है। यदि हम उज्ज्वल भविष्य मूल्यांकन आप कर रहे हैं और सारा संसार ज्ञेय बन सकता | चाहते हैं तो वर्तमान में रागद्वेष रूपी अपराध को छोड़ने का है किन्तु मूल्यांकन करने वाला किस जगह बैठा है इसे भी संकल्प लेना होगा। देखने की बहुत आवश्यकता है। अध्यात्म का प्रारंभ उसी | अतीत में अपराध हो गया कोई बात नहीं। स्वीकार कर लिया। दंड भी ले लिया। अब आगे प्रायश्चित करके आपकी घड़ी की कीमत है, आपकी खरीदी हुई प्रत्येक भविष्य के लिए अपराध नहीं करने का जो संकल्प ले लेता वस्तु की कीमत है, किन्तु कीमत करने वाले की कीमत क्या | है वह ईमानदार कहलाता है। वह अपराध अतीत का है है। अभी यह जानना शेष है। जिसने इसको जान लिया उसने | वर्तमान का नहीं। वर्तमान यदि अपराध मुक्त है तो भविष्य महावीर भगवान को जान लिया। अपनी आत्मा को जान लेना भी उज्ज्वल हो सकता है। यह वर्तमान पुरूषार्थ का परिणाम ही सारे विश्व को जान लेना है। भगवान महावीर के दिव्य ज्ञान है। भगवान महावीर यह कहते हैं कि डरो मत। तुम्हारा में सारा विश्व प्रतिबिंबित है। उन्होंने अपनी आत्मा को जान अतीत पापमय रहा है किन्तु यदि वर्तमान सच्चाई लिए हुए है लिया है। अपने शुद्ध आत्म-तत्त्व को प्राप्त कर लिया है। अपने तो भविष्य अवश्य उज्ज्वल रहेगा। भविष्य में जो व्यक्ति आप को जान लेना ही हमारी भारतीय संस्कृति की विशेषता है, आनंदपूर्वक, शांतिपूर्वक जीना चाहता है उसे वर्तमान के यही आध्यात्म की उपलब्धि है। जहाँ आत्मा जीवित है वहीं ज्ञेय | प्रति सजग रहना होगा। पदार्थों का मूल्यांकन भी संभव है। पाप केवल दूसरों की अपेक्षा से ही नहीं होता। आप ___ शुद्ध आत्म तत्त्व का निरीक्षण करने वाला व्यक्ति | अपनी आत्मा को बाहरी अपराध से सांसारिक भय के महान पवित्र होता है। उसके कदम बहुत ही धीमे-धीमे | कारण भले ही दूर रख सकते हैं, किन्तु भावों से होने वाला उठते हैं किन्तु ठोस उठते हैं। उनमें बल होता है, उनमें | पाप, हिंसा, झूठ, चोरी आदि हटाये बिना आप पाप से मुक्त गंभीर होता है, उसके साथ विवेक जुड़ा हुआ रहता है। नहीं हो सकते। भगवान महावीर का जोर भावों की निर्मलता विषय-कषाय उससे बहुत पीछे छूट जाता है। | पर है। जो स्वाश्रित है। आत्मा में जो भाव होगा वही तो बाहर जो व्यक्ति वर्तमान में ज्ञानानुभूति में लीन है वह | कार्य करेगा। अंदर जो गंदगी फैलेगी वह अपने आप बाहर व्यक्ति आगे बहुत कुछ कर सकता है। किन्तु आज व्यक्ति आयेगी। बाहर फैलने वाली अपवित्रता के स्त्रोत की ओर अतीत की स्मृति में उसी की सुरक्षा में लगा है या फिर | देखना आवश्यक है। यही आत्मानुशासन है जो विश्व में भविष्य के बारे में चिंतित है कि आगे क्या होगा। इस प्रकार शांति और आनंद फैला सकता है। वह स्वयं वर्तमान पुरुषार्थ को खोता जा रहा है। वह भूल रहा ___ जो व्यक्ति कषाय के वशीभूत होकर स्वयं शासित है कि वर्तमान में से ही भूत और भविष्य निकलने वाला है। | हुए बिना विश्व के ऊपर शासन करना चाहता है वह कभी अनागत भी इसी में से आयेगा और अतीत भी इसी में | सफलता नहीं पा सकता। आज प्रत्येक प्राणी राग-द्वेष, विषय-- ढलकर निकल चुका है। जो कुछ कार्य होता है वह वर्तमान कषाय और मोह-मत्सर इनको संवरित करने के लिए संसार में होता है और विवेकशील व्यक्ति ही उसका संपादन कर | की अनावश्यक वस्तुओं का सहारा ले रहा है। यथार्थतः सकता है। भविष्य की ओर दृष्टि रखने वाला आकांक्षा और | देखा जाये तो इन सभी को जीतने के लिए आवश्यक पदार्थ आशा में जीता है । अतीत में जीना भी बासी खाना है । एक मात्र अपनी आत्मा को छोड़कर और दूसरा है ही नहीं। वर्तमान में जीना ही वास्तविक जीना है। आत्म तत्त्व का आलंबन ही एकमात्र आवश्यक पदार्थ है। अतीत भूत के रूप में व्यक्ति को भयभीत करता है | क्योंकि आत्मा ही परमात्मा के रूप में ढलने की योग्यता और भविष्य की आशा, तृष्णा बनकर नागिन की तरह खड़ी रखता है। रहती है, जिससे जो वर्तमान में जीता है वह निश्चित होता इस रहस्य को समझना होगा कि विश्व को संचालित है, वह निडर और निर्भीक होता है। साधारण सी बात है कि | करने वाला कोई एक शासन कर्ता नहीं है। और न ही हम -फरवरी-मार्च 2005 जिनभाषित 1 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524294
Book TitleJinabhashita 2005 02 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2005
Total Pages52
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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