SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 30
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ भारतीय साधना में 'मन' की अवधारणा डॉ. श्रीमती पुष्पलता जैन भारतीय अध्यात्म-साधना का केन्द्र 'मन' है। इस साधना । और बधजन जैसे जैन अध्यात्मसाधक कवियों ने भी अभिव्यक्त में मन की शक्ति अचिन्त्य है। वह संसार भ्रमण और मोक्ष दोनों | की है। तलसीदास के समकालीन बना का कारण है। मन को सांसारिक विषय-वासनाओं की ओर से | का रूपक देकर उसके स्वभाव को स्पष्ट करते हुए लिखा हैहटाकर जब उसे आत्मा में ही स्थिर कर देते हैं तो वह योगयुक्त | 'जिस प्रकार किसी व्यक्ति को समुद्र पार करने के लिए एक ही अवस्था कही जाती है (गीता ६.१८.१०)। कठोपनिषद् में इसी | मार्ग रहता है जहाज, उसी तरह भव समुद्र से मुक्त होने के लिए को परमगति कहा गया है। मन , वचन और काय से युक्त जीव | ज्ञानी साधक को मन रूपी जहाज का आश्रय लेना पड़ता है।' का वीर्य परिणाम रूप प्राणियोग कहलाता है और यही योग मोक्ष | (बनारसी विलास, पृ. १५२-५३)। भक्त शिरोमणि सूरदास ने का कारण है (योगशास्त्र १.१५)। इसीलिए योगीन्दु ने उसे | भीपंचेन्द्रियों का स्वामी बताया है और उसे वश में करना आवश्यक 'मेरोमन अनत कहाँ सुख पावै। जैसे उड़ि जह कहा है को पंछी, पुनि जहाज पर आवै' पंचहणायहुं वसिकरहु जेण होती वसि अण्ण। आदि कहकर इसी बात की पुष्टि की है और मन को भ्रम मूल विणट्ठइ तरुवरह, अवसइ, सुक्कहि पण॥ | अथवा दुबिधा का घर माना है। (परमात्म प्रकाश, १४०, पृ. २८३) । सभी संतों को इसकी बड़ी चिंता है कि इस मन की मन की गति बँकि तीव्रतम होती है इसलिए उसे वश में | दुविधा कब मिटेगी और कब वह सद्गुरु के वचन अपने घट के करना साधक के लिए अत्यावश्यक है। मन की चंचलता-शिथिलता अंदर धारण करेगा, कब धन की तृष्णा दूर होगी, कब वह धर्म के साधना को डगमगाने में कारणभूत है। शायद यही कारण है कि | मर्म को पहचानेगा ओर कब परमार्थ सख को प्राप्त करेगा। हर साधना में मन को वश में करने की बात कही है। यह महाकवि तुलसीदास और भैया भगवतीदास दोनों ही इस मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि संसारी व्यक्ति के मन को जिस ओर जाने संसारी मन को मूढ़ (मूर्ख) की संज्ञा देते हुए सीख देते हैंसे रोका जाता है, वह उसी ओर दौड़ता है। जिस सांसारिक पदार्थों 'रे मन मूढ सिखवन मेरी'। (२) ऐसी मुढ़ता या मन से उसने कष्ट पाया है, उसी में वह प्रीति करता है। की। परिहरि राम-भक्ति, सुर-सरिता, आस करत ओसकन की।' संत कबीर ने माया और मन के संबंध को अविच्छिन्न (विनयपत्रिका)। तू अपने चेतन स्वरूप को भूलकर इस संसार में कहकर उसे सर्वत्र दुःख और पीड़ा का कारण कहा है कहाँ भटक गया है। यह तो मात्र व्याधि का घर है। तुम्हें तो मन पाँचोंके बसिपरा, मन के बस नहिंपाँच। क्रोध, मान, माया, लोभ, मोह, विषय-सुख आदि विकारों को जितदेखंतित दौलगि, जित भाखतित आँच॥ तिलांजलि देकर अविनाशी ब्रह्म की आराधना करनी चाहिए (कबीरवानी पृ.६) (चेतन कर्म चरित्र, पृ. २३४-२४६)। यह माया मन को उसी प्रकार बिगाड़ देती है जिस प्रकार एक अन्य रचना 'पंचेन्द्रिय संवाद' में भैया भगवतीदास ने कांजी दूध को बिगाड़ देती है (संत दादूदयाल भाग १, पृ. | मन के दोनों पक्षों को बडी सघडता से रखा है११८)। एक अन्य पद में कबीर मन को संबोधित करते हुए कहते (१) मन से ही कर्म क्षीण होते हैं, करुणा पुण्य होता है हैं- हे मन! तू व्यर्थ भ्रमण करता फिरता है? तू विषयानंदों में और आत्मतत्व पहचाना जाता है, इसलिए मन इन्द्रियों का राजा है लिप्त है, फिर भी तूझे संतोष नहीं। तृष्णाओं के पीछे बावला बना और इन्द्रियाँ मन की दास हैं। फिरता है। मनुष्य जहाँ भी पग बढ़ाता है, उसे माया-मोह का (२) रे मन! तू व्यर्थ में गर्व मत कर। तुम्हारे कारण ही बंधन जकड़ लेता है। आत्मारूपी स्वच्छ स्वर्णथाली को उसने प्राणी नरक में जाता है, पाप करता है तब उसका अनुमोदन करता पापों से कलुषित कर लिया है है, इन्द्रियाँ तो शरीर के साथ ही बैठी रहती हैं पर तू दिन-रात काहेरेमनदह दिसि धावौ, इधर-उधर भटकता रहता है जिससे दुष्कर्म बंधते जाते हैं, इसलिए बिषियासंगिसंतोषनपावे। रे मन, तू राग-द्वेष को दूर कर परमात्मा में अपने को लगाओ। जहाँ-जहाँ कल्प, वहाँ-वहाँ बंधनो, 'मन बत्तीसी' में भैया भगवतीदास ने मन के चार प्रकार बताये रतनकोथाल कियौते रंधनों॥ हैं- सत्य, असत्य, अनुभय और उभय। प्रथम दो प्रकार संसार की (कबीर ग्रंथावली, पद ८७) ठीक इसी प्रकार की विचारसरणी कविवर बनारसीदास | और मन का झुकाते हैं और शेष दो प्रकार भवपार कराते हैं- 'मन 28 मई 2004 जिनभाषित Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524285
Book TitleJinabhashita 2004 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2004
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy