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हो।
४. आदिपुराण पर्व ११,श्लोक १४७ का अर्थ इस प्रकार है- | १.आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज के द्वारा गृहस्थ अवस्था
वह अहमेन्द्र साथ-साथ उत्पन्न हुए दिव्य वस्त्र, दिव्य | में लिखे गये हितसंपादक में पृष्ठ ३० पर इस प्रकार कहा है, माला और दिव्य आभूषणों से विभूषित जिस मनोहर शरीर को | 'मतलब यह है कि भगवान की प्रतिमा का अभिषेक करने की धारण करता था, वह ऐसा जान पड़ता था मानो सौन्दर्य का समूह | प्रथा आज तो कुछ और ही तरह की हो गई है, जो भाई जब चाहे,
जब अभिषेक कर लिया करते हैं, एक बार ही नहीं दिन में अनेक ५.महाकवि पुष्पदन्त विरचित महापुराण भाग-१, पृष्ठ | बार भी कर लेते हैं। जितने पूजक हों वे सभी पूजा करने से पूर्व में २५९ में इस प्रकार कहा है: उस स्वर्ग में मुकुटों , हारों , केयूरों | श्री भगवान की प्रतिमा जी का अभिषेक करें, यह एक नियम दोरों से सहित देव एक क्षण में उत्पन्न होते हैं।
बताया जाता है। यह बात ठीक नहीं है। प्रतिमा का अभिषेक एक उपरोक्त सभी प्रमाणों से यह स्पष्ट है कि उपपाद शैया से | बार ही होना चाहिए।' बाहर आते समय देवगण वस्त्र रहित नहीं होते, बल्कि विभिन्न २. पूज्य आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने श्री गुलाब वस्त्राभूषणों आदि से सहित उत्पन्न होते हैं।
चन्द्र जी, पटना वाले (सागर) के, एक इसीप्रकार के प्रश्न के प्रश्नकर्ता : नवीन कुमार जैन, फिरोजाबाद
उत्तर में, इस प्रकार कहा था, 'जिस वेदी पर अभिषेक होने के जिज्ञासा : तत्वार्थसूत्र अध्याय ७ में जो शून्यागार आदि उपरान्त पूजा प्रारम्भ हो चुकी हो वहाँ दुबारा अभिषेक नहीं होना अचौर्यव्रत की भावनाएँ कही गई हैं, वे श्रावकों के लिए किस | चाहिए। जिनको अभिषेक का नियम है वे या तो अभिषेक के अपेक्षा से मान्य हो सकती हैं?
समय पर मंदिर जी आवें या फिर उस वेदी पर अभिषेक करें जहाँ समाधान : पं. सदासुखदास जी ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार
अभी पूजा प्रारंभ न हुई हो। अन्यथा पूजकों को व्यवधान होता में श्लोक नं. १२१ के उपरान्त भावना नामक अधिकार में उपरोक्त विषय पर इसप्रकार लिखा है: शून्यागार, विमोचितावास, | ३. क्षुल्लक मनोहरलाल जी वर्णी ने मोक्षशास्त्र पुस्तक परोपरोधाकरण, भैक्ष्यशुद्धि, साधर्माविसम्वाद ये पन्च भावना
२२ में लिखा है कि, 'जिनप्रतिमा का अभिषेक एक बार ही करना अचौर्यव्रत की हैं। या अचौर्य अणुव्रत का धारक गृहस्थ हू पन्च | चाहिए बार-बार नहीं।' भावना निरन्तर भावता रहै। व्यसनी मनुष्य तथा दुष्ट मनुष्य तथा आजकल इस प्रश्न पर बहुत से मंदिरों में विसम्बाद सुनने तीव्रकषायी कलह का करनेवाला पुरुषनिकरि शून्य मकान होय | में आता है। ऐसे मंदिरों के आयोजकों से निवेदन है कि वे सभी तहाँ बसने का भाव राखै, जातें तीव्रकषायी दुष्टनि के नजीक बसने | पूजकों की सहमति से अभिषेक का समय निर्धारित करें। और में परिणाम की शुद्धता नष्ट हो जाय, दुर्ध्यान प्रकट हो जाय, तारौं सभी पूजकों का कर्तव्य होता है कि वे निर्धारित समय पर आकर पापीनि करि शून्य मकान में बसना, सो ही शून्यागार भावना है। | अभिषेक कर लिया करें। वास्तव में जिनबिम्ब का अभिषेक एक बहरि जिस मकान में अन्य दूजा का झगड़ा नाहीं होय तहाँ | बार ही होना उचित है। निराकुल बसना, सो विमोचितावास है॥ २॥ बहुरि अन्य के जिज्ञासा : ज्योतिषी देवों की जघन्य आयु पल्य का मकान में आप जबरी” नाहीं धंस बैठना, सो परोपरोधाकरण | आठवां भाग है या साधिक पल्य का आठवां भाग? भावना है ॥३॥ बहुरि अन्याय अभक्ष्य कू त्यागि भोगान्तराय का समाधान : ऐसा प्रतीत होता है कि आपने तत्वार्थसूत्र क्षयोपशम के आधीन मिलया जो रस नीरस भोजन तामें समता अध्याय ४ में सूत्र ४० और ४१ को लेकर उपरोक्त प्रश्न किया हो। धारि लालसा रहित भोजन करना, सो भैक्ष्यशुद्धि भावना है ।।४।। तत्वार्थसूत्र अध्याय ४ के ४० वें सूत्र 'ज्योतिष्काणां च' के अनुसार साधर्मी पुरुष में वाद विसम्वाद नाहीं करना, सो साधर्मी विसम्वाद ज्योतिषी देवों की उत्कृष्ट स्थिति एक पल्य से कुछ अधिक कही भावना है ॥ ५ ॥ ऐसें अचौर्य अणुव्रत के धारकनि के पन्च भावना | गई है। इसके बाद सूत्र नं. ४१ 'तदष्टभागो पराः' का अर्थ भावने योग्य हैं।
| सर्वार्थसिद्धिकार ने किया है कि 'तस्यपल्योपमस्याष्ट भागो जिज्ञासा : जिनबिम्ब का अभिषेक कितनी बार किया | ज्योतिष्काणां अपरा स्थिति' अर्थात् ज्योतिषियों की जघन्य स्थिति जाना उचित है?
| उसका अर्थात् पल्योपम का आठवां भाग है। इस सूत्र का अर्थ समाधान : इस प्रश्न का समाधान किसी भी श्रावकाचार | पढ़ते समय ऐसा भी अर्थ बनता है कि तत् अर्थात् उस साधिक आदि में मुझे दृष्टि गोचर नहीं हुआ। अतः अन्य आधारों से इस पल्योपम का आठवां भाग जघन्य स्थिति होनी चाहिए। हमें सिर्फ प्रश्न का समाधान खोजते हैं
| इस पर विचार करना है कि ज्योतिषियों की जघन्य स्थिति पल्य
24 मई 2004 जिनभाषित
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