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________________ संयुक्त परिवार का अर्थशास्त्र एवं समाज शास्त्र श्री प्रमोद शर्मा (सी.ए.) देश अनेक भीषण समस्याओं से रूबरू है। शायद बेरोजगारी | घर के बड़े परस्पर एवं समाज के अन्य व्यक्तियों के साथ उपजी इस प्रजातंत्र के इतिहास में अपने चरम पर है। उद्योग जगत मंदी | अनेकानेक कानून एवं व्यवस्था की समस्याओं को एक सुदृढ़ एवं की मार से कृशकाय हो गया है, चारों ओर भूख, गरीबी, अशिक्षा, | परिपूर्ण न्याय व्यवस्था की तरह चुटकी में सुलझा देते हैं । इस प्रकार जनसंख्या वृद्धि, भ्रष्टाचार एवं कानून-व्यवस्था जैसे विकराल संयुक्त परिवार एक अच्छे विद्यालय, स्वास्थ्य केंद्र, परामर्श केंद्र, दानव मुँह फैलाए खड़े है। सरकारें अपने बोझ और अंतर्निहित न्यायालय, सांस्कृतिक रक्षक, मंदिर एवं मस्जिद जैसी अनेकानेक विरोधाभासों के चलते जनता के सिर पर रखी गठरियाँ हो गई हैं भूमिकाएँ समय-समय पर संपन्न करता है, जहाँ यह सोचना लाजमी एवं जन समस्याओं की वृद्धि एवं उसके फैलाव में समय-समय है कि यदि पश्चिम के विकसित देशों में पसरी पूर्णतया भौतिक पर अपना योगदान देकर अपनी क्रूर उपस्थिति का एहसास कराती उपभोक्तावादी संस्कृति यदि हमारे देश में पूरी तरह आ गई तो हम रहती हैं। यह तथ्य भलीभाँति समझ लेना होगा कि सरकारी | शायद पुन: आदम युग में पहुँच जायेंगे। भारत की इस संस्था एवं कुप्रबंध एवं फिजूखर्ची की कठोर कीमत आखिर नागरिकों को ही | परम्परा पर हम जितना भी गर्व करें, कम होगा। चुकानी होती है। यूरोप के तथाकथित विकसित देशों को सामाजिक सुरक्षा अचरज की बात यह है कि इतनी सारी समस्याओं के बीच | के मद में अपने बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा व्यय करना होता भी हम पूर्ण धैर्य के साथ जीवित हैं, चलताऊ ढंग से प्रसन्न भी हैं। है। यह कुछ देशों में 40 से 45 प्रतिशत तक है । यदि भारत के बजट कुल मिलाकर अपना वक्त ठीक-ठाक कट रहा। विचारणीय | से इतनी बड़ी राशि इस मद में व्यय की जाती, तो हमारी प्राथमिकता विषय यह है कि इतनी असुविधाओं के बाद भी ऐसी कौन-सी | पूर्णतया भिन्न होती और सरकार की लंगोट भी न बँध पाती। एक शक्ति, सामर्थ्य एवं विशेषता हमें ऐसा करने के लिये उत्प्रेरित | औसत भारतीय को गैर जिम्मेदार एवं अकर्मठ कहना एक सफेद करती है। भारतीय समाज में इस सहनशीलता, आशावादिता, | झूठ है और यह प्रचार भारत की छबि को कलंकित करने का भारी सहिष्णुता एवं गतिशीलता की कुंजी हमारी संयुक्त परिवार प्रथा है। | षड्यंत्र है। ऐसा सोचनेवाला कोई भी व्यक्ति भारत के संयुक्त इस प्रणाली ने विदेशी अर्थशास्त्र के विद्वानों द्वारा प्रतिपादित अनेक परिवार के संचालन एवं समस्याओं से रूबरू होने के उपरांत यह नियम झूठे साबित कर दिए हैं। यह प्राचीन संस्था अब भी हमारी बोलकर तो देखे। पिछले दिनों उपजी सामाजिक एवं सांस्कृतिक रक्षा का एक अभेद्य कवच बनी हुई है। यह कल्पना करना भी परिवर्तन की हवा ने देश की संयुक्त परिवार प्रथा को शनैः-शनै: खौफनाक है कि यदि भारत में संयुक्त परिवार प्रथा न होती तो, यह | क्षीण किया है। यह ठीक वैसे ही है, जैसे कि औद्योगिक एवं देश घोर अराजकता की चपेट में होता एवं क्या घटित-दुर्घटित | रासायनिक कचरे ने धरती की अस्मिता अर्थात् उसकी ओजोन परत होता, इसको सोचा भी नहीं जा सकता। को छिद्र-छिद्र किया है। . इस देश के सुचारु संचालन में संयुक्त परिवार प्रथा का औसत भारतीय को जब हम अपने परिवार का संचालन अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण योगदान है, जिसके चलते सरकार सामाजिक | करते हुये देखते हैं, तो अफसोस होता है कि काश यह भावना सत्ता सुरक्षा' जैसे महत्त्वपूर्ण दायित्व से काफी हद तक मुक्त रही है एवं संस्थान में भी उपजी होती और हमारा देश चहुँमुखी प्रगति कर रहा इस मद में व्यय की जाने वाली राशि, जो कि काफी बड़ी होती, | होता। भारत के नागरिकों में राष्ट्रीय चरित्र की कमी है, इस धारणा सरकार को नहीं करनी पड़ती है। वास्तव में आज देश के सम्मुख का प्रत्युत्तर एवं प्रतिवाद भी संयुक्त परिवार प्रथा द्वारा ही मिलता जितनी भी समस्याएँ हैं, उनका सामना, हम केवल इसलिये कर पा हैं। सरकार संयुक्त परिवारों के कारण अनेक दायित्वों से मुक्त रही रहे हैं, कि हम संयुक्त परिवार में रहते हैं। यह संस्था सरकार के है अतएव ऐसी स्थिति में सरकार एवं नीतिनियंताओं से यह अपेक्षा लिये वरदान है एवं बेफिक्री का कारण भी है। कभी कुछ विद्वान रखना वाजिब है कि जन-कल्याण हेतु योजना, कानून एवं नियम आम भारतीय पर गैर-जिम्मेदार होने का आरोप भी लगाते रहते हैं, बनाते समय यथासंभव व्यक्ति आधारित सोच से हटकर भारत की परंतु बड़ा ही सुखद आश्चर्य होता है, जब हम देखते हैं कि किसी जमीनी सच्चाइयों को आधार बनाया जाये एवं परिवारों के सशक्तिकरण संयुक्त परिवार की ओर, जिसमें अमूमन एक या दो सदस्य कामकाजी के ईमानदार प्रयास किये जायें। शासकीय नीतियों की दिशा भी इस होते हैं एवं उनकी आय संपूर्ण परिवार के जीवनयापन का, बिना प्रकार मोड़ना होगी कि इन सबका आधार भारत के परिवारों के किसी भेदभाव के साधन बनती है। परिवार में तीन पीढ़ियाँ समभाव अध्ययन पर आधारित हो। ये कार्य अत्यंत दुष्कर भी नहीं हैं. से उपलब्ध होती हैं एवं आय के सीमित साधनों से बूढ़े माँ-बाप क्योंकि अभी हाल ही में भारत की जनगणना संपन्न हुई है एवं की दवा, इलाज के पैसे, बेरोजगार बच्चों का जेब खर्च, विवाह सरकार के पास समस्त आंकड़े भी मौजूद हैं। पश्चिमी देशों के योग्य कन्या के दहेज का प्रबंध, घर एवं वर की तलाश, यदि स्थिति व्यक्ति-आधारित विकास का अंधानुकरण छोड़कर हमें अपनी और भी विकट हो तो विधवा बहू एवं विपत्तिग्रस्त विवाहित | योजनाएँ हमारी घरेलू परिस्थितियों को दृष्टिगत रखकर बनाना लड़की का भी निर्वहन होता है। भारत में यदि विधि का शासन है । नितांत आवश्यक है। तो उसकी जननी एवं लागू करने वाली शक्ति संयुक्त परिवार ही है।। नवभारत (जबलपुर ) 19 मार्च 2002 से साभार - अप्रैल 2003 जिनभाषित 23 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524272
Book TitleJinabhashita 2003 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2003
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size3 MB
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