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________________ चाहिए। “अब तो मुझे इस संसार से विदा होना ही है, किन्तु एक । मरण प्राप्त करता है, वह अति शीघ्र मोक्ष को प्राप्त करता है। जैन बार में अपने अमुक मित्र से मिल लेता तो बहुत अच्छा होता.'' शास्त्रों के अनुसार सल्लेखनापूर्वक मरण करने वाला साधक या इस प्रकार का भाव मित्रानुराग है। सल्लेखनाधारी साधक को | तो उसी भव से मुक्त हो जाता है या एक या दो भव के अन्तराल इससे भी बचना चाहिए। "मुझे इस साधना के प्रभाव से आगामी से। ऐसा कहा गया है कि सल्लेखनापूर्वक मरण होने से अधिक से जन्म में विशेष भोगोपभोग की सामग्री प्राप्त हो", इस प्रकार का अधिक सात-आठ भवों में तो मुक्ति हो ही जाती है। इसीलिए जैन विचार करना निदान है। साधक को इससे भी बचना चाहिए। साधना में सल्लेखना को इतना महत्त्व दिया गया है तथा प्रत्येक जीने-मरने की चाह, भय, मित्रों के अनुराग और निदान ये पाँचों साधक " श्रावक और मुनि दोनों" को जीवन के अन्त में प्रीतिपूर्वक सल्लेखना को दूषित करने वाले अतिचार हैं। साधक को इनसे | सल्लेखना धारण करने का उपदेश दिया गया है। बचना चाहिए। जो एक बार अतिचाररहित होकर सल्लेखनापूर्वक __ 'जैनधर्म और दर्शन' से साभार जयपुर में प्रतिभा सम्मान विमला जैन, । जिला एवं सत्र न्यायाधीश परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज इस युग | इस अवसर पर श्रीमती सरयू दफतरी ने अपने ममत्व एवं के महान आचार्य के रूप में विश्वविश्रुत हो चुके हैं। उनकी मातृत्व से ओतप्रोत उद्बोधन में छात्रों को प्रेरित किया कि वे त्याग, तपस्या और संघ संचालन की क्षमता अद्भुत है। उन्होंने अपने लौकिक जीवन में जैन धर्म की मौलिक जीवन शैली के आत्महित के साथ-साथ जो लोक हितकारी कार्यों के लिए महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं- जल छानकर पीना, जैन भोजन करना, प्रेरणा और प्रोत्साहन दिया है, वह अनुकरणीय एवं प्रशंसनीय | सामायिक करना, अपने गुरु के प्रति श्रद्धा भाव रखना आदि को हैं । ऐसे महान आचार्य के प्रबुद्ध एवं संवदेनशील शिष्य हैं मुनि | सदैव ध्यान में रखकर पालन करें। श्री क्षमासागर जी। क्षमासागर जी मैत्री और प्रेम के अनूठे और छात्रों को उद्बोधन देते हुए मैत्री समूह के संचालक श्री अद्भुत चितेरे हैं। उन्होंने अपनी मृदता और रसमयी अनुभूतियों सुरेश जैन ने कहा कि प्रतिभा भले ही जन्मजात होती हो, किन्तु को अपने लेखन में सहजता और सरलता से अभिव्यक्त किया | आध्यात्मिक आशीर्वाद और भौतिक प्रोत्साहन से उसमें अत्यधिक है। उन्होंने अपनी कविताओं में प्रकृति और जीवन के रिश्तों की निखार आ जाता है। हमारे जीवन के चतुर्मुखी विकास में धार्मिक बारीक बुनावट की है। आचार्य श्री विद्यासागर जी की जीवनी आदर्शों एवं नैतिक मूल्यों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। आत्मान्वेषी उनकी अनुपम कृति है। किसी साहित्यकार ने इस अद्भुत प्रवचन शैली के माध्यम से क्षमासागर जी ने कृति की समीक्षा करते हुए लिखा है कि मातृत्व की अनुभूति आध्यात्मिक चेतना को सामाजिक/शैक्षणिक सरोकारों से जोड़ते और आध्यात्मिकता का रसास्वादन कराने वाली यह कृति गोरकी हुए शैक्षणिक जागत के उदीयमान नक्षत्रों को अत्यधिक प्रभावित के विश्व प्रसिद्ध उपन्यास माँ के समान ऊचाइयाँ प्राप्त करेगी। किया और भावी जीवन में सर्वोच्च सफलता प्राप्त करने हेतु उन्हें मुनिश्री के सान्निध्य में जयपुर में आयोजित यंग जैन | अत्यंत भावविह्वल होकर अपना स्नेह-आशीर्वाद दिया। अनेक अवार्ड 2002 का कार्यक्रम निर्धारित समयावधि में सानन्द और छात्र अनुपम गुणों से सुशोभित उनके आंतरिक व्यक्तित्व की सफलतापूर्वक सफल हुआ। इस कार्यक्रम का समय प्रबंधन, | ओर आकर्षित हए और उनके प्रति पूर्ण श्रद्धा प्रकट करते रहे। सरसता और शालीनता अत्यंत सराहनीय एवं अनुकरणीय रही श्री नरेश सेठी, अध्यक्ष चातुर्मास समिति,जयपुर और है। इस समारोह के लिए 1050 छात्रों की प्रविष्टियाँ प्राप्त हुई और उनके सहयोगी पदाधिकारियों, डॉ., शीला जैन और उनकी सहयोगी उनमें से 400 छात्रों को जयपुर आमंत्रित किया गया। जयपुर में महिला संघों, मैत्री समूह के संरक्षक श्री शांतिलाल जैन भोपाल, उपस्थित 327 छात्रों को देश की सुप्रसिद्ध उद्योगपति श्रीमती श्री पन्नालाल बैनाड़ा, आगरा, श्री पारस कासलीवाला, जयपुर श्री सरयू दफतरी, मुम्बई द्वारा सम्मानित किया गया और सर्वोच्च उजास जैन जयपुर, डॉ. निशा जैन भोपाल, डॉ. एस.पी. जैन एवं सफलता प्राप्त करने वाले छात्रों को सर्वोच्च कोटि की 6 रजत श्री राजेश जैन, बड़कुल, छतरपुर, श्रीमती मोना सोगानी, जयपुर शील्ड, 54 रजत शील्ड और उपस्थित सभी 327 छात्र/छात्राओं एवं उनके सभी साथियों का निष्ठापूर्ण सहयोग अत्यधिक सराहनीय को मैडल, घड़ी, पुस्तकें, आकर्षक उत्तरीय परिधान एवं मार्ग और अनुकरणीय रहा। व्यय प्रदान किया गया। 35 महाविद्यालयनीय छात्र/छात्रओं को 30, निशात कॉलोनी, अपना अध्ययन करने हेतु छात्रवृत्तियाँ प्रदान की गईं। भोपाल , म.प्र.- 462003 -दिसम्बर 2002 जिनभाषित 7 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524268
Book TitleJinabhashita 2002 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2002
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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