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________________ आपके पत्र, धन्यवाद: सुझाव शिरोधार्य 'जिनभाषित' की नियमित प्राप्ति पत्रिका जगत की एक बड़ी उपलब्धि है। पत्र-पत्रिकाओं के प्रति जन साधारण की अरुचि में सबसे बड़ा कारण उनकी अनियमितता ही है। सो यहाँ नहीं है। मई अंक में सम्पादकीय लेख 'दोनों पूजा-पद्धतियाँ आगमसम्मत, ' जैनधर्म की ऐतिहासिकता, पाठ्चों की सुन्दरता में मीठा जहर पानमसाला, प्राकृतिक चिकित्सान्तर्गत स्वास्थ्य और सौन्दर्यनाशक मोटापा आलेख विशेष उपयोगी लगे हैं। पत्रिका निरन्तर प्रगति पथ पर अग्रसर रहे, ऐसी शुभभावना है । के अवसर पर श्वेताम्बर जैन समाज द्वारा तैयार किया गया 'भक्तामर स्तोत्र' का आडियो विडियो कैसेट जीटी.वी. द्वारा पूरे एक घंटे तक रोज पर्युषणपर्व में दिखाया जाता रहा, जिसे पूरे देश और विदेश के लोगों ने देखा और जैनधर्म की प्रभावना हुई, परन्तु दिगम्बर जैन समाज ने क्या किया ? कभी इस पर भी हम विचार करें । एक ओर हम जैनधर्म को विश्वधर्म कहते हैं और दूसरी ओर उसके प्रचार-प्रसार के लिए आधुनिक मीडिया से परहेज करते हैं। हमें तो पंचकल्याणक एवं गजरथ जैसे आयोजनों में ही विश्वकल्याण दिखाई देता है क्या कभी हमने इस बात का भी लेखा-जोखा किया है कि इतने पंचकल्याणक होने के बावजूद विश्व का कितना कल्याण हुआ अथवा जैनधर्म का कितना प्रचारप्रसार हुआ ? हाँ, इन आयोजनों से पंचों का कल्याण जरूर हो जाता है। पं. पवन कुमार जैन शास्त्री प्राध्यापक - श्री गो. दि. जैन सिद्धान्त संस्कृत महाविद्यालय मुरैना (म.प्र.) - 476001 मई, 2002 की जिनभाषित पत्रिका प्राप्त हुई। इसमें सम्पादकीय लेख "दोनों पूजा-पद्धतियाँ आगमसम्मत" दर्शाकर लेखक ने स्याद्वाद पद्धति से वर्षों से चली आ रही तेरहपंथी और मान्यता वालों के मध्य व्याप्त कटुता और अहं भावना को हल करने का एक अच्छा सकारात्मक प्रयास किया है, इससे एक ओर जहाँ समाज में विघटन की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी, वहीं दूसरी ओर समरसता का प्रवाह भी होगा । श्री कैलाश मडवैया का लेख "जैन धर्म की ऐतिहासिकता" उन लोगों के गाल पर करारा तमाचा है, जो बिना गहन अध्ययन किए ही पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर जैन धर्म की प्राचीनता के बारे में कुछ भी ऊल-जलूल लिखते रहते है। मेरा सुझाव है कि यह लेख प्रत्येक जैन समाज के व्यक्ति को अवश्य पढ़ना चाहिए ताकि वह जैनधर्म की प्राचीनता से न केवल परिचित हो सके, बल्कि समय आने पर उन लोगों को प्रमाणसहित सटीक उत्तर भी दे सके, जो अपनी अल्पज्ञता के कारण जैनधर्म को या तो बौद्धधर्म की शाखा बताते हैं या फिर जैन तीर्थकरों के इतिहास को मनगढ़ंत बताते हैं। पाउचों की सुन्दरता में मीठा जहर के माध्यम से श्रीपाल जी 'दिवा' ने सामान्यजन को सचेत किया है। यह लेख उन लोगों को अवश्य पढ़ाया जाना चाहिए, जो पाउचों का अंधाधुन्ध सेवन करके अपने कीमती जीवन को स्वयं ही मृत्यु के मुँह में ढकेल रहे हैं। जिज्ञासा समाधान में श्री बैनाड़ाजी की सलाह से मैं कतई सहमत नहीं हूँ। उन्होंने श्वेताम्बरों द्वारा तैयार की गई कैसेट ' भक्तामर स्तोत्र' को सिर्फ इसलिए हटा देने की बात कही है कि उसमें 48 के बजाए 44 काव्य हैं। मेरा यह कहना है कि बजाए इस कैसेट को हटाने के, हम भी (दिगम्बर जैन समाज के लोग) भक्तामर की ऐसी सुरीली एवं मधुर आवाज में कैसेट तैयार करें तो यह एक सकारात्मक एवं प्रशंसनीय कदम होगा। अभी पिछले पर्युषण पर्व Jain Education International अन्त में, शिखरचंद जी का हास्य-व्यंग्य लेख "लो, मैं आ गया " काफी रोचक लगा। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद कर्मचारी को जिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, उसका हुबहू चित्रण करके शिखरचंद जी ने पाठकों को काफी गुदगुदाया है। पत्रिका के उज्ज्वल भविष्य की कामना सहित । विनोद कुमार 'नयन' एल.आई.जी. - 24 ऐशबाग स्टेडियम के पास भोपाल (म.प्र.) 'जिनभाषित' का अप्रैल 2002 अंक प्राप्त हुआ। नैनागिरि मंदिर का अति सुन्दरचित्र मुखपृष्ठ पर छाप कर आपने पत्रिका की सुन्दरता में चार चाँद लगा दिये हैं। इससे सम्बन्धित लेख भीतर के पृष्ठों में देखने को मिला श्री सुरेश जैन द्वारा लिखित। एक से बत्तीस तक के पृष्ठों में पहले किसे पढ़ा जाए और बाद में किसे, इसके चयन में ही मुझे कई मिनिट का समय लगा। सारे पृष्ठों की सामग्री एक से बढ़कर एक लगी । लेख चाहे तीर्थंकर महावीर से सम्बन्धित हो या शाकाहार से या प्राकृतिक चिकित्सा से अथवा नवनिर्माण से, सभी का अपना महत्त्व तथा प्रसंग है। छोटी-छोटी कविताओं से पत्रिका की उपयोगिता बढ़ जाती है। इन सभी के पीछे आपका तथा समस्त 'जिनभाषित' परिवार का स्तुत्य प्रयास है और यही वह चीज है जिसकी कमी कई जैन पत्र-पत्रिकाओं में खलती है। मेरी ऐसी कल्पना है कि 'जिनभाषित' एक दिन जैन और अजैन सभी के बीच सर्वप्रिय पत्रिका बन कर रहेगी। For Private & Personal Use Only डॉ. विनोद कुमार तिवारी रीडर, इतिहास विभाग यू. आर. कालेज रोसडा (बिहार) - 848210 -जून 2002 जिनभाषित 1 www.jainelibrary.org
SR No.524263
Book TitleJinabhashita 2002 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2002
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
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