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________________ व्यंग्य तृष्णाकुलः शान्तिविहीनलोकः शिखर चन्द्र जैन धन्य हैं वो लोग जो बेतहाशा दौड़ना सचमुच जरूरी चुपचाप बैठ लेते हैं। चुपचाप रह आदमी को जीने के लिये जो चाहिए, वह मूलत: खेतों था। मेरे विचार से, इसके पीछे, लेना एक निहायत ही उम्दा में पैदा होता है, अनाज भी, कपास भी। अत: नगरों-महानगरों निश्चय ही अन्य कारण होंगे आदत है, जो बहुत कम लोगों में बसने अथवा रेलों, बसों, वायुयानों में बेतहाशा भीड़ खड़ी जिनका अनुसंधान आवश्यक में पाई जाती है। जो चीज जितनी कर देने का कारण आदमी की बुनियादी जरूरतों को पूरा था। और जैसी कि मेरी आदत कम पायी जाती है उसका उतना है, इसकी जिम्मेदारी स्वयं ही उम्दा होना नैसर्गिक माना करना तो कतई नहीं लगता। इसके पीछे अवश्य हीकुछ ज्यादा अपने ऊपर लेते हुए मैंने इस जाता है। हीरे का मूल्यांकन इसी | पाने की लालसा नजर आती है। संदर्भ में काफी खोज-बीन की सिद्धांत के अंतर्गत किया गया है। भिन्न-भिन्न नगरों-महानगरों है, वरना है तो वो कोयले की ही जाति का। | ब्रीफकेस धारी व्यक्ति से मैंने पूछा - 'आखिर । में नाना प्रकार के लोगों से मिला हूँ। उनके कहते हैं कि महानगरों में लोग बड़ी | इतनी भाग-दौड़ क्यों?' इंटरव्यू लिए हैं। मंतव्य जाने हैं और इस तरह भाग-दौड़ करते हैं। अल-सुबह से लेकर देर _ 'पापी पेट की खातिर।' उसने फौरन एकत्रित सारी जानकारी एक कम्प्यूटर में डाल रात तक यात्रा ही करते रहते हैं। कभी पैदल, कहा! कर उसके विश्लेषण की प्रक्रिया में हूँ। अब कभी बस में तो कभी ट्रेन से। रास्तों पर मैं विस्मित हो गया। इतने सुसंस्कृत, चूँकि उपलब्ध जानकारी बहुत भारी है, तमाम भीड़ ही भीड़ नजर आती है। बिना क्रीमी लेयर वाले व्यक्ति का, बंदर नचाने जिसके कि फलस्वरूप सम्पूर्ण विश्लेषण कर किसी से कंधा रगड़े एक कदम भी चलना वाले मदारी की भाषा में जवाब देना वाकई किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचने में कुछ दूभर होता है। जहाँ तक दृष्टि जाती है, समुद्र चौंकाने वाला था। सहसा विश्वास करना ज्यादा ही समय लगने की संभावना है, मेरे में उठती लहरों की तरह लोगों के समूह निरंतर कठिन था कि पेट के मामले में सबकी सोच विचार से, इस प्रक्रिया में जो मोटी-मोटी बातें आगे बढ़ते हुए दिखाई देते हैं। लगता है कि एक जैसी होती है। सामने आ रही हैं उन्हें यहाँ प्रस्तुत कर देना महानगरों की जनसंख्या के मामले में ___ 'लेकिन पेट की आवश्यकता तो इतनी समीचीन होगा। जनगणना के आंकड़े सही नहीं होते, क्योंकि नहीं होती कि उसे पाप करना पड़े।' मैंने पहती बात जो स्पष्ट रूप से उभर कर मेरे हिसाब से वहाँ लोगों की संख्या अनन्त प्रतिवाद करते हुए कहा - 'मूलतः प्राकृतिक ऊपर आई है, वह यह कि लोग जो इतनी होती है। विशुद्ध गणितीय अनन्त, जिसमें अवस्था में प्राप्त शाकाहार के लिए अभिकल्पित अधिक यात्रा करते हैं सो केवल इस कारण कुछ जोड़ने-घटाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। उदर तो बल्कि इस कारण तंग रहता है कि कि यात्रा के साधन उपलब्ध हैं। यदि ये बाँस वैसे महानगरों में ही क्यों? अब तो लोग उसके अन्दर न जाने क्या सटर-पटर नहीं होते तो जाहिर है कि इनसे निर्मित नगरों और कस्बों में भी लोग बेतहाशा भागते डालते रहते हैं जिसे पचा पाना उसे सहज नहीं बाँसुरियाँ भी नहीं बजतीं। दरअसल अनवरत नजर आते हैं। कभी, ट्रेन आते समय, किसी होता और फिर केवल पेट को ही पापी क्यों भागम-भाग का बीजारोपण तब हुआ था जब नगर की रेल्वे क्रासिंग पर पहुँचे तो पायेंगे कहा जाता है? आदमी समग्रता में पापी क्यों अंग्रेजों ने हमारे देश में रेल की पटरियाँ कि बंद गेट के दोनों ओर मानो युद्ध पर उतारू नहीं माना जाता?' बिछाई थीं। ट्रेनों के चलते ही दूरियाँ इतनी दो विरोधी सेनाएँ तैनात हों। केवल गेट खुलने "यह मैं नहीं बतला पाऊँगा।' उसने सिमट गईं कि पुणे के लोग, रोज सुबह नौकरी की देर है कि दोनों ओर से लोग टूट पड़ेंगे। कहा - 'मैं एक प्रबंधन विशेषज्ञ हूँ, जीव करने मुम्बई जाकर शाम को वापिस आने ज्यादातर लोग, अपने-अपने वाहन का इंजन विज्ञानी नहीं। मैं तो बस इतना जानता हूँ कि लगे। चालू रखे, क्लच दबा, गियर लगा, यों यह भीषण प्रतिस्पर्धा का युग है। इसमें केवल निश्चित ही यह एक क्रांतिकारी तत्पर रहते हैं ज्यों ओलम्पिक की 'हर्डल-रेस' वे ही जीवन के अधिकारी हो पाते हैं जो सर्वथा परिवर्तन था क्योंकि इसके पूर्व लोग जब में भाग लेते हुए 'फ्लेग ऑफ' की प्रतीक्षा सक्षम हों। और सर्वांगीण सक्षमता के लिये यात्रा पर जाते थे तो यह मानकर चलते थे में हों, अथवा अपने निजी घर में अचानक सतत सक्रियता अनिवार्य है।' कि वापिस आना शायद ही संभव हो। अतः लग गई आग को बुझाने जा निकले हों। हर इस तरह कुछ वजनदार शब्द मेरी ओर तदनुसार वे अपने परिवार से विदा भी ले लेते व्यक्ति अत्यंत उतावला दिखाई देता है। उछाल कर वे गमन कर गए। जाहिर है, जल्दी थे। पर ट्रेनों के चलने तथा कालान्तर में यात्रा एकदम अधीर, व्याकुल, तड़फड़ाया हुआ में थे, वरना इतनी रोचक-सैद्धांतिक चर्चा के अन्य सुगम साधन अस्तित्व में आ जाने सा! छोड़ भला कौन बुद्धिजीवी जाना चाहेगा। से लोगों की सोच में जबरदस्त बदलाव एक रोज, एक महानगर में, एक बेहद लेकिन मेरी जिज्ञासा यथावत् रही। यह | आया और अधिक से अधिक लोगों में यात्रा व्यवस्थित ढंग से सुसज्जित, सूट-बूटबात मेरे गले इंच-भर भी नहीं उतरी कि | करने की आदत पड़ गयी। इस संदर्भ में आज | जीवित रहने के लिये आदमी को इस कदर | -सितम्बर 2001 जिनभाषित 21 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524255
Book TitleJinabhashita 2001 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2001
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
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