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________________ किया है और जो तपस्या में भी बढ़ा-चढ़ा है, ऐसा मुनि भी यदि | आचार्यों ने ऐसे दम्भी साधुओं से सावधान रहने के लिये मुमुक्षुओं लौकिक-मुनियों तथा लौकिक-जनों का संसर्ग नहीं त्यागता तो वह | को कितनी ही चेतावनी दी है और उनको परखने की कसीटी भी दी संयमी मुनि नहीं होता अथवा नहीं रह पाता है, संसर्ग के दोष से, | है, जिसका ऊपर संक्षेप में उल्लेख किया जा चुका है साथ ही यहाँ अग्नि के संसर्ग से जल की तरह, अवश्य ही विकार को प्राप्त हो | तक भी कह दिया है कि जो ऐसे लौकिक मुनियों का संसर्ग सम्पर्क जाता है - नहीं छोड़ता वह निश्चित रूप से सूत्रार्थ-पदों का ज्ञाता विद्वान्, शमितणिच्छिदसुत्तत्थपदो समिदकसाओ तवोधिगो चावि। कषाय और तपस्या में बढ़ा-चढ़ा होते हुए भी संयत नहीं रहता, लोगिगजन-संसग्गं ण चयदि जदि संजदो ण हवदि।।68।। असंयत हो जाता है। इससे अधिक चेतावनी और ऐसे मुनियों के इससे लौकिक-मुनि ही नहीं, किन्तु लौकिक-मुनियों की अथवा संसर्ग-दोष का उल्लेख और क्या हो सकता है? इस पर भी यदि लौकिक जनों की संगति न छोड़ने वाले भी जैन मुनि नहीं होते, इतना कोई नहीं चेते, विवेक से काम नहीं ले और गतानुगतिक बनकर अपना और स्पष्ट हो जाता है, क्योंकि इन सबकी प्रवृत्ति प्रायः लौकिकी होती आत्म-पतन करे तो इसमें उन महान् आचार्यों का क्या दोष? है, जबकि जैन-मुनियों की प्रवृत्ति लौकिकी न होकर अलौकिकी हुआ | मनि-निन्दाका हौआ! करती है, जैसा कि श्री अमृतचन्द्राचार्य के निम्न वाक्य से प्रकट है आजकल जैन-समाज में मुनिनिन्दा का हौआ खूब प्रचार में अनुसरतां पदमेतत् करम्बिताचार-नित्य-निरभिमुखा। आ रहा है, अच्छे-अच्छे विद्वानों तक को वह परेशान किये हुए है एकान्त-विरतिरूपा भवति मुनीनामलौकिकी वृत्तिः।।13।। और उन्हें मुनि-निन्दक न होने के लिये अपनी सफाई तक देनी पड़ती . पुरुषार्थसिद्ध्युपाय है। जब किसी मुनि की लौकिक प्रवृत्तियों, भवाभिनन्दिनी वृत्तियों, इसमें अलौकिक वृत्ति के दो विशेषण दिये गए हैं : एक तो कुत्सित आचार-विचार, स्वेच्छाचार, व्रतभंग और आगम की करम्बित (मिलावटी-बनावटी-दूषित) आचार से सदा विमुख रहने अवहेलना जैसे कार्यों के विरोध में कोई आवाज उठाई जाती है तो वाली। दूसरा एकान्ततः (सर्वथा) विरतिरूपा-किसी भी पर-पदार्थ में उसका कोई समुचित उत्तर न देकर प्रायः मुनि-निन्दा का आरोप लगा आसक्ति न रखने वाली। यह अलौकिकी वृत्ति ही जैन मुनियों की जान दिया जाता है, और इस तरह मुनि-निन्दा का आरोप उन लोगों के प्राण और उनके मुनि-जीवन की शान होती है। बिना इसके सब कुछ हाथ का एक हथियार बन गया है, जिन्हें कुछ भी युक्तियुक्त कहते फीका और निःसार है। नहीं बनता। मुनि निन्दा का फल कुछ कथाओं में दुर्गति जाना और इस सब कथन का सार यह निकला कि निम्रन्थ रूप से प्रव्रजित बहुत कुछ दुःख कष्ट उठाना चित्रित किया गया है, इस भय से ऐसे दीक्षित जिनमुद्रा के धारक मुनि दो प्रकार के हैं- एक वे जो निर्मोही मुनियों की आगम-विरुद्ध दूषित प्रवृत्तियों को जानते हुए भी हर किसी सम्यग्दृष्टि हैं, मुमुक्षु-मोक्षाभिलाषी हैं, सच्चे मोक्षमार्गी हैं, अलौकिकी को उनके खिलाफ मुँह खोलने तक का साहस नहीं होता। भय के वृत्ति के धारक संयत हैं, और इसलिये असली जैन मुनि हैं! दूसरे वातावरण में सारा विचार-विवेक अवरुद्ध हो जाता है और कर्तव्य वे, जो मोहके उदयवश दृष्टिकार को लिये हुए मिथ्यादृष्टि हैं, अन्तरंग के रूप में कुछ भी करते-धरते नहीं बनता। नतीजा इसका यह हो से मुक्तिद्वेषी हैं, बाहर से दम्भी मोक्षमार्गी हैं, लोकाराधन के लिये रहा है कि ऐसे मुनियों का स्वेच्छाचार बढ़ता जाता है, जिसके धर्मक्रिया करने वाले भवाभिनन्दी हैं, संसारावर्तवर्ती हैं, फलतः फलस्वरूप समाज में अनेक कठिन समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं। समाज असंयत हैं, और इसलिये असली जैन-मुनि न होकर नकली मुनि के संगठन का विघटन हो रहा है, पार्टीबन्दियाँ शुरू हो गई हैं और अथवा श्रमणाभास हैं। दोनों की कुछ बाह्यक्रियाएँ तथा वेष सामान्य पक्ष विपक्ष की खींचातानी में सत्य कुचला जा रहा है। यह सब देखकर होते हुए भी दोनों को एक नहीं कहा जा सकता, दोनों में वस्तुतः चित्त को बड़ा ही दुःख तथा अफसोस होता है और समाज के भविष्य जमीन-आसमान का सा अन्तर है। एक कुगुरु संसार-भ्रमण करने की चिन्ता सामने आकर खड़ी हो जाती है। कराने वाला है तो दूसरा सुगुरु संसार-बन्धन से छुड़ाने वाला है। इसी समझ में नहीं आता, कि जो महान् जैनाचार्यों के उक्त से आगम में एक को वन्दनीय और दूसरे को अवन्दनीय बतलाया कथनानुसार परमधर्म का अनुष्ठान करते हुए भी जैनमुनि ही नहीं, है। संसार के मोही प्राणी अपनी सांसारिक इच्छाओं को पूर्ति के लिये मुमुक्षु नहीं, मोक्षमार्गी नहीं, सांसारिक प्रवृत्तियों का अभिनन्दन करने भले ही किसी परमार्थतः अवन्दनीय की वन्दना-विनयादि करें, कुगुरु वाले भवाभिनन्दी लौकिक-जन हैं उनके विषय में किसी सत्यको सुगुरु मान लें, परन्तु एक शुद्ध सम्यग्दृष्टि ऐसा नहीं करेगा। भय, समालोचक पर मुनिनिन्दा का आरोप कैसे लगाया जा सकता है? मुनि आशा, स्नेह और लोभ में से किसी के भी वश होकर उसके लिये हो तो मुनि-निन्दा भी हो सकती है, मुनि ही नहीं तब मुनि-निन्दा कैसी? वैसा करने का निषेध है।" यदि विचार-क्षेत्र में अथवा वस्तु-निर्देश के रूप में कुछ मुनियों यदि भवाभिनन्दी लौकिक मुनि अपना बाह्य वेष तथा रूप के दोषों को व्यक्त करना भी मुनि-निन्दा में दाखिल हो तो जिन महान् लौकिक ही रखते तो ऐसी कोई बात नहीं थी, दूसरे भी अनेक ऐसे आचार्यों ने कतिपय मुनियों को भवाभिनन्दी, आहार-भय-मैथुनादि त्यागी अथवा साधु-संन्यासी हैं जो संसार का नेतृत्व करते हैं। परन्तु संज्ञाओं के वशीभूत, लोकाराधन के लिए धर्मक्रिया करने वाले मलिन जो वेश तथा रूप तो धारण करते हैं मोक्षाभिनन्दी का और काम करते अन्तरात्मा लिखा है, उनके लिए मूढ़ (मिथ्यादृष्टि) लोभपरायण, क्रूर, है भवाभिनन्दियों के -संसाराऽवर्तवर्तियों के, उनसे जिन-लिंग लज्जित भीरु (डरपोक), असूयक (ईर्ष्यालु), शठ (अविवेकी) जैसे शब्दों तथा कलंकित होता है। यही उनमें एक बड़ी भारी विषमता है और का प्रयोग किया है, उन्हें मुक्ति-द्वेषी तक बतलाया है तथा लौकिकइसी से परीक्षकों की दृष्टि में भेषी अथवा दम्भी कहलाते हैं। परोपकारी कार्यों में प्रवृत्त करने वाले लौकिकजन एवं असंयत (अमुनि) घोषित 10 सितम्बर 2001 जिनभाषित - Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524255
Book TitleJinabhashita 2001 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2001
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
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