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आर्द्रकुमरनइं भेटणउं, ए तुम्हे एकांत जाई रे, आपी नि अम्ह विनती, ईम करज्यो कहुं हुं भाइ रे... परने मुखि सुणीया दूरथी, गुण तुमथी मेरु समान रे, तुम्हे गुणाकर मित्रजी, तुम्हे मोटा चतुर सुजाणो रे... किम थाइ तुम्ह सारिखी, अम्ह सरखी भेट उदारो रे, तो पण चिंती विनोदनी, छई मित्रजी करवारो रे... केहनइ रखे देखाडता, ऊंडा सायरशुं होज्यो रे, अंधारइ जइ ओरडी, पोते उघाडी जोज्यो रे... संदेशउ ए सीखवी, सनमान दीधी विदाय रे, अनुक्रमि आदन देश ते, पहुता जिहां आईकराय रे... जे नृप श्रेणिकनुं हतुं, ते ढौकन रायने आपि रे, एकांति कुंअर कन्हुई, जइ आगलि प्राभृत थाप्यो रे.. संदेसउ सघलउ सुणी, आनंद आर्द्रकुमार रे, माणस पई मंजउषा, आणी अपवरक मोजारो रे... न्यानसागर कहि सांभळउ, ढाल पांचमी सुविचारो रे, जिन प्रतिमा दरिसण थकी, हवई किम लहि छई निस्तारो रे... ९
अभयकुमारनुं बुद्धिकौशल्य औत्पातिकी बुद्धि, कार्मिकी बुद्धि, वैनयिकी बुद्धि, पारिणामिकी बुद्धिना भंडार अभयकुमार विचारे छे के, नक्की आ कुमार नजीकमां सिद्धिपद पामवानो हशे, एटला माटे ते महारी साथे मैत्री करवानी ईच्छा करे छे. जगतमां पण मृगलाओ मृगलानी साथे, वृषभ वृषभनी साथे, घोडा घोडानी साथे अने पंडित पंडितनी साथे मैत्री करे छे. तेवी मैत्री ज लाभकारी बने छे. एक कविए लख्युं छे के
चार मिले, चोसठ हसे, मिले बे कर जोड,
ज्ञानी से ज्ञानी मिले, उठे सात करोड... पापी जीव हमेशा पापीने ज प्यार करे छे, धर्मी जीव धर्मीने ईच्छे छे. चतुर पुरुष चतुरनो संग करे छे अने मूरख मनुष्य मूरखने शोधे छे. आ वात आबालगोपाल जाणे छे. तेथी आर्द्रकुमार धर्म करवाने योग्य जीव लागे छे. तेथी जो ए धर्मने न पामे
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