SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 6
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३६४ तो उससे मालूम हुआ कि इन दोनों प्रतियों में छपी हुई प्रतिके वे छः श्लोक नहीं हैं ओ देहलीवाली प्रतिमें भी नहीं है, और न वे दस श्लोक ही हैं जो देहली की प्रतिमें छुपी हुई प्रतिले अधिक पाये गये हैं और जिन सबका ऊपर उल्लेख किया गया है। इसके सिवाय इन प्रतियों में छुपी हुई प्रतिके नीचे लिखे हुए पन्द्रह श्लोक भी नहीं हैं जैनहितैषी । क्षुधा तृष्णा भयं द्वेषो रागो मोहश्च चिन्तनाम् । ज़रारुजा च मृत्युश्च स्वेदः खेदो मदोर तिः ||४ | विस्मयो जननं निंद्रा विषादोऽष्टादशध्रुवः । त्रिजगत्सर्वभूतानां दोषाः साधारणा इमे ||५|| एतैर्दोषैर्निर्मुक्तः सोऽयमाप्तो निरंजनः । विद्यन्ते येषु ते नित्यं तेऽत्र संसारिणः स्मृताः ६ स्वतत्वपरतत्वेषु हेयोपादेय निश्चयः । संशयादिविनिर्मुक्तः ससम्य दृष्टिरुच्यते ||९|| रक्तमात्रप्रवाहेण स्त्री निन्द्या जायतेस्फुटम् । द्विधातुर्ज पुनर्मासं पवित्रं जायते कथम् ॥१९॥ अक्षरैर्नविना शब्दस्तेऽपि ज्ञानप्रकाशकाः । तद्रक्षार्थ च षट् स्थाने मौनं श्रीजिनभाषितम् ४१ दिव्यदेहप्रभावर्ताः सप्तधातुविवर्जिताः । गर्भोत्पत्तिर्न तत्रास्ति दिव्यदेहास्ततोमताः । ५७ । ज्ञानवान् ज्ञानदानेन निर्भयोऽमयदानतः । अन्नदानात्सुखी नित्यं निर्व्याधिर्भेषजाद्भवेत् ६९ येनाकारेण मुक्तात्मा शुक्लत्वध्यान प्रभावतः । तेनायं श्रीजिनोदेवो बिम्बाकारेण पूज्यते ७२ आप्तस्यासन्निधानोऽपि पुण्यायाकृति पूजनम् । तार्त्तमुद्रा न किं कुर्युर्विषसामर्थ्य सूदनम् ७३ जन्मजन्म यदभ्यस्तं दानमध्ययनं तपः । तेनैवाभ्यासयोगेन तत्रैवाभ्यस्यते पुनः ॥७४॥ अष्टमी चाष्टकर्माणि सिद्धिलाभाचतुर्दशी । पंचमी केवलज्ञानं तस्मात्तत्रयमाचरेत् ॥७९॥ कालक्षेपो नकर्तव्य आयु क्षीणं दिने दिने । यमस्य करुणा नास्ति धर्मस्य त्वरिता गतिः ९४ अनित्यानि शरीराणि विभवो नैव शास्खतः । नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः ९५ Jain Education International [ भाग १५ जीवंतं मृतकं मन्ये देहिनं धर्मवर्जितम् । मृतो धर्मेण संयुक्तो दीर्घजीवी भविष्यति ९६ छुपी हुई प्रतिसे इन प्रतियोंमें अधिक पद्य कोई नहीं है; क्रम-भेदका उदाहरण सिर्फ़ एक ही पाया जाता है और वह यह है कि छपी हुई प्रतिमें जो पद्य ५० और ५२ नम्बरों पर दिये हैं, वे पद्य इन प्रतियों में क्रमशः ३६ और ३८ नम्बरों पर - अर्थात् आगे पीछे - पाये जाते हैं । रही पाठभेद की बात, वह कुछ उपलब्ध ज़रूर होता है और कहीं कहीं इन दोनों प्रतियों में परस्पर भी पाया जाता है । परंतु वह भी कुछ विशेष महत्व नहीं रखता और उसमें ज्यादातर छापे तथा लेखकों की भूलें शामिल हैं। तो भी दो एक खास खास पाठभेदोंका यहाँ परिचय करा देना मुनासिब मालूम होता है; और वह इस प्रकार है (१) तीसरेपद्य में 'निर्ग्रन्थः स्यात्तपस्वी च' ( तपखी निग्रंथ होता है) के स्थान में भाराकी प्रतियों में 'निर्मन्थेन भवेन्मोक्षः" (निग्रंथ होने से मोक्ष होता है) ऐसा पाठ दिया है। देहलीवाली प्रतिमें भी यही पाठ 'निर्ग्रन्थः न भवेन्मोक्षः' ऐसे अशुद्ध रूपसे पाया जाता है । (२) छपी हुई प्रतिके ३०वे पद्य में 'न पापं च अमीदेयाः ऐसा जो एक चरण है वह ताड़पत्रवाली प्रतिमें भी वैसा ही है । परंतु धाराकी दूसरी प्रतिमें उसका रूप 'न परेषाममीदेयाः' ऐसा दिया है और देहलीवाली प्रतिमें वह 'न दातव्या इमे नित्यं' इस रूप में उपलब्ध होता है । " (i) छपी हुई प्रतिमें एक पद्य * इल प्रकार दिया हुआ है * देइलीको प्रतिमें भी यह पद्य प्रायः इसी प्रकार से है, सिर्फ इतना भेद है कि उसमें पूर्वार्धको उत्तरार्ध और उत्तरार्धको पूर्वार्ध बनाया गया है। For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522894
Book TitleJain Hiteshi 1921 Ank 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1921
Total Pages42
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size6 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy