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________________ जैनहितैषी। [भाग १५. शरीर जैसा व्यवहार किया जाय जो सनाके प्रत्येक अंग और ढंगकी जाँच अत्यन्त प्यारा और उपयोगी होते हुए करें, और रूढ़ियोंके मोहको जलांजलि भी, प्राणरहित हो जाने पर घरमें नहीं देकर, उन्हें बिलकुल उपासना-तत्वके रक्खा जा सकता। अथवा यो कहिये कि अनुकूल बना लेवें। ऐसा हो जानेपर अपने विरोधके द्वारा वे यही सूचित करते समाजके फिर किसी भी समझदार हैं कि, उपासनाके शरीरमें अमुक अमुक व्यक्तिको उनकी इस उपासनापर आपत्ति खराबियाँ उत्पन्न हो गई हैं उन्हें शीघ्र करने की कोई वजह नहीं रह सकती। दूर किया जाय, नहीं तो समूचे शरीर के समाज-हितैषियों को समाजमें इस नष्ट हो जानेका भय है; या शरीरको उपासना तत्वके फैलाने और इसके अनुअमुक अंग गल गया है: उसका यदि प्रति- कूल समाजकी प्रवृत्ति करानेका खास कार नहीं हो सकता तो उसे अलग कर तौरसे यत्न करना चाहिए। इसी में समाजदिया जाय, नहीं तो उसके संसर्गसे का कल्याण है। और इसी हितसाधनाकी. दूसरा अंग भी खराब हो जायगा, इत्या- दृष्टिसे यह निबन्ध लिखा गया है। दिक। जब समाजकी तरफसे इस बरोधकी कुछ सुनाई नहीं होती, बल्कि उलटी सरसावा । ता० २१-१-१९२१ खींचातानी बढ़ जाती है-समाज अपने दोषों पर विचार नहीं करता और न अपनी उपासनामें जीवन संचार करनेका कोई उपाय करता है, बल्कि उसे ज्योंका स्यों अस्वस्थ दशामें ही रखना चाहता है ___ गहरे अनुसंधान तथा गहरे विवेचन और इस तरहपर उसकी हालत ज्यादा को लिए हुए तत्व और इतिहास विषयखराब होने लगती है तब विरोध अपना के मौलिक लेखोंके तय्यार करने में कितना उग्र रूप धारण कर लेता है और उसके परिश्रम होता है-शक्ति और समयका उसमें कितना व्यय किया जाता है, इस कारण, देयादेयका विचार नष्ट होकर, उपासनाके उन अच्छे अच्छे स्वस्थ अंगों बातको वे ही विद्वान् अनुभव कर सकते हैं जो स्वयं उस प्रकारका काम किया को भी धक्का पहुँच जाता है जिनको धक्का पहुँचाना विरोधकारियों को कभी भी इष्ट करते हैं अथवा करना जानते हैं । अन्यथा, नहीं होता। और इस तरहपर एक अच्छी ऐसे लेखोकी जिस एक पंक्ति तथा वाक्यऔर उपयोगी संस्था समाजके दोषसे । को साधारण जनता श्राधे सेकंड में पढ़ बहुत कुछ नष्ट भ्रष्ट हो जाती है और . डालती है उसके प्रस्तुत करनेमें कितने भावी संतति उसके समुचित लाभोंसे 0 घंटे अथवा, कभी कभी, कितने दिन लगे वंचित ही रह जाती है । होंगे, इसे वह नहीं समझ सकती। इसलिये, समाजके व्यक्तियोंका यह -खंड विचार। खास कर्तव्य है कि वे उपासनाके तत्वको अच्छी तरहसे समझकर अपनी उपा जैनियोंमें स्थानकवासी और तारनपंथी जैसे सम्प्रशय ऐसे ही बिरोधके परिणाम हैं। Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522887
Book TitleJain Hiteshi 1921 Ank 01 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1921
Total Pages68
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size9 MB
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