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________________ अङ्क ९] ., प्राचीन ग्रन्थोंका संग्रह और उनकी रक्षा। . २६५ स्थानोंके मन्दिरोंमें विराजमान कराई जा सकती. महासभामें कुछ लोग तो अवश्य ऐसे उपस्थित हैं । हमको चाहिए कि हम वहाँके भट्टारकको होंगे जो और नहीं तो इस कार्यकी आवश्य. मजबूर करें कि वे सिद्धान्तग्रन्थोंकी-प्रतिलिपियाँ कताका अनुभव करते हैं और जिन्हें बातूनी कर लेने दें और यदि वे न मानें तो इसके लिए जमाखर्चके बदले कुछ ठोस काम करनेकी सरकारसे सहायता मांगी जावे । हमारा विश्वास इच्छा उत्पन्न हो गई है। है कि सरकार हमें इस काममें बिना किसी अन्तमें इस सम्बन्धमें हम अपने पाठकोंका विलम्बके सहायता देवेगी। ध्यान इस ओर आकर्षित करना आवश्यक ___ एक फोटोग्राफरको कुछ महीनोंके लिए रख समझते हैं कि श्रीमान् ऐलक पन्नालालजीने झाललेनेसे यह काम बहुत आसानीसे हो जाता है। रापाटनमें एक 'सरस्वतीभण्डार' स्थापित करबिलकुल मूल प्रतिके समान चाहे जितनी नेका प्रारंभ किया है और उसके लिए वे कई प्रतियाँ कराई जा सकती हैं और उक्त सिद्धान्त वर्षोंसे चन्दा कर रहे हैं । कहते हैं कि यह ग्रन्थ सदाके लिए अमर किये जा सकते हैं। चन्दा पचास हजारके लगभग हो गया है पूनेके भाण्डारकर इन्स्टिट्यूटमें बारहवीं और शीघ्र ही एक लाख हो जायगा । यह शताब्दिकी लिखी हुई एक आवश्यकसत्रकी बड़ी खुशीकी बात है। यह भी सुना है कि टीका है। ताडपत्र पर इससे पहलेकी लिखी त्यागीजी इस संस्थाका ट्रस्डीडरानेवाले हुई कोई भी प्रति अब तक कहीं भी उपलब्ध हैं । इस विषयमें हमारा नम्र निवेदन यह है कि . नहीं हुई है । इस प्रतिकी तीन चार प्रतियाँ झालरापाटन स्थान ऐसी विशाल संस्थाके योग्य फोटू लेकर ही कराई गई हैं । हमनें उन्हें देखा नहीं है । यह संस्था बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली, " है। बड़ी ही अच्छी हैं और खर्च भी ऐसा. . . और काशी जैसे स्थानोंमें ही शोभा देगी और कुछ बहुत अधिक नहीं पड़ा है। अलभ्य - वहीं इसका यथेष्ट उपयोग हो सकेगा। इस लिए ग्रन्थोंकी कापी करानेका यह बहुत ही अच्छा ऐलकजीसे प्रार्थना करना चाहिए कि वे सर्वऔर सुगम उपाय है। सम्मतिसे उसे झालरापाटनसे हटा दें और उसे - सना है अबकी बार कानपरमें दिगम्बर- तमाम दिगम्बर समाजकी संस्था बना दें। यदि जैनमहासभाका जल्सा बड़े ठाठ और उत्साहसे इस संस्थाको सुव्यस्थित पद्धतिसे चलाया होनेवाला है। जल्सेके समय एक जैनसाहि- जायगा, अच्छे योग्य पुरुष इसके कार्य-सम्पात्यकी प्रदर्शिनी खोलनेका भी प्रबन्ध किया दनके लिए रक्खे जावेंगे और उसमें जिस रीतिसे जा रहा है। क्या हम आशा करें कि महा- मैं पहले लिख चुका हूँ उस रीतिसे ग्रन्थसंग्रह सभामें इस विषय पर कुछ विचार किया किया जावेगा तो जैनसमाजकी एक बड़ी भारी जायगा ? यद्यपि इस बातकी संभावना बहुत जरूरत रफा हो जायगी। ही कम है कि उसे तीर्थक्षेत्रोंकी मुकद्दमेबाजी, हम अपने सहयोगियोंसे प्रार्थना करते हैं कि । पण्डितों और बाबुओंके झगड़ों, धर्मके डूब वे भी इस चर्चाको उठा लेनेकी कृपा करें और जानेके भयोंसे बचनेके उपायों और ऐसे ही दिगम्बरजैनसमाजके माथेसे इस कलंकके दसरे अनेक कामोंकी चिन्ताओंके मारे इस टीकेको मिटानेका प्रयत्न करें किसने बड़े कामकी ओर ध्यान देनेका अवकाश मिलेगा; धनी समाजमें उसका कोई निजका अच्छा फिर भी इस आशासे यह चर्चा उठाना पुस्तकालय नहीं है। -बम्बई ५-८-२० आवश्यक समझा है कि इतने दिनोंके बाद 3- ११-१२ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522882
Book TitleJain Hiteshi 1920 Ank 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1920
Total Pages32
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size5 MB
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