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________________ २५८ जैनहितैषी- [भाग १४ करता है। स्कूलोंमें जो विद्यादान होता है, इसमें सन्देह करनेको जरा भी जगह नहीं है। उसकी सीमा है, बालविद्याका ही दान हुआ "ये सब लायबेरियाँ मन्दिरोंमें ही होती थीं। करता है; परन्तु यह दान असीम, अनन्त है- मन्दिरोंके पुरोहित ही पढ़ते पढ़ाते और यत्न. इसकी सीमा भी नहीं है और अन्त भी नहीं है। पूर्वक उन्हें रखते थे । मिसरकी यह लायब्ररी पृथिवीमें जो कुछ ज्ञान है, प्रायः सभी पुस्तकोंमें ईसाके जन्मसे ४-५ हजार वर्ष पहले बनी थी। लिपिबद्ध है । इसलिए लायब्रेरीमें जब सभी. उसके वाद मिसरमें बराबर लायबेरियाँ बनती तरहकी पुस्तकें रहती हैं तब जितने तरहकी रही हैं । उस समय ये पत्थरोंकी पुस्तकें कितनी विद्यायें हैं, जितने तरहका ज्ञान है सभीका बनी थीं, इसका कुछ ठिकाना नहीं है। उसके द्वारा दान होता है। अत एव लायब्रेरी “सन् १८५० में लेयार्ड साहबने निनिवा खोलना बड़े ही पुण्यका कार्य है। नामक नगरमें खुदाई आरम्भ की थी। ३० फुट ___“ लायबेरियोंका इतिहास बहुत लम्बा है। खोदनेके बाद उन्हें एक बड़ा भारी कमरा मनुष्य जबसे सभ्य हुआ है, जबसे उसने मिला । उस कमरेका सारा मध्यभाग एक फुट अपने मनके भाव बाहर अंकित करने सीखे हैं, ऊँची पत्थरकी लादियोंसे (पत्थरके चौकोर तभीसे लायब्रेरियोंकी उत्पत्ति हुई है । ' अंकित टुकड़ोंसे ) सजाया हुआ था और लादिकरना' कहनेका कारण यह है कि लिखनेके योंमें आदिसे अन्ततक तिकौने अक्षर लिखे लिए वर्णमालाकी आवश्यकता होती है। हुए थे । पण्डितोंका अनुमान है कि यह परन्तु वर्णमालाकी उत्पत्तिके पहले भी मनुष्य असुरराज ( असीरियाके राजा ) सार्डे नापोमनके भाव प्रकट करता था और वे वर्णमालाके लासकी लायब्ररी थी। इसमें लगभग २०,००० द्वारा नहीं किन्तु चित्र अंकित करके, जीव-जन्तु पृथक् पृथक् ग्रन्थ थे जिनमें कितने ही कोष, और वृक्षपत्र आदि अंकित करके । उस समय अनेक महाकाव्य, इतिहास और ज्योतिषके ग्रन्थ छापेखाने नहीं थे, कागज नहीं था, तालपत्र और थे । अर्थात् एक बड़े राजाकी लायब्रेरीमें जो भोजपत्रोंका भी व्यवहार नहीं था। उस समय कछ रहना चाहिए था वह सभी था । नि मनके भाव प्रकट करनेके लिए चित्र अंकित इतनी बड़ी लायबेरीका पता लगने पर यूरोपके करना पड़ते थे पत्थरोंपर और मिठीके ईटोपर- लोगोंको बड़ा कुतूहल हुआ और इस शोधके और वे भी पकाई हुई नहीं किन्तु धूपमें सुखाई काममें उनका उत्साह बढ़ गया। अब वे मेसपटमें हुई ईटें । पत्थरोंपर लिखी हुई एक लायब्रेरी जहाँ कहीं कोई बड़ासा टीला दिखा वहीं खोदने मिसर देशमें जमीनके बहुत नीचे पाई गई है। लगे। फल यह हुआ कि इस खुदाईमें उन्हें उस समय मिसरके पिरामिडों ( समाधिस्तूपों) न जाने कितने मकान, कितनी मूर्तियाँ और का बनाना शुरू हुआ था या नहीं, इसमें सन्देह कितने ग्रन्थालय मिले ! यह सब देख सुनकर है । जिन लोगोंने बड़े बड़े पिरामिड बनाये और पढ़ कर सबका यह विश्वास हो गया है कि थे, उन लोगोंसे तो पहलेकी यह अवश्य ही ईसाके जन्मके ४००० वर्ष पहले मेसपटमें सुमेर है । उसके पत्थरोंपर केवल चित्र बने हुए और आकाद नामकी दो जातियोंका निवास हैं । इस लायबे में जितनी पुस्तकें थीं, था। सुमेर जातिके लोग दादीकी हजामत बनदीवालपर उन सबकी एक सूची दी हुई है। वाते थे, पर आकाद नहीं बनवाते थे। सुमेर इसलिए वे सचमुच ही लायब्रेरीकी पुस्तकें हैं सबसे पहले सभ्य हुए थे। वे पत्थरकी मूर्तियाँ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522882
Book TitleJain Hiteshi 1920 Ank 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1920
Total Pages32
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size5 MB
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