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________________ ४४६ जैनहितैषी [भाग १३ उन लोगोंके लिए सेर दो सेर दूध एक साँसमें आरंभ कर दें,व्यायाम करें, और तरह तरह के पी जाना कोई बात ही न थी। उस समयकी पारिश्रमके काम करें, तो जैनियोंकाक्षय बहुत कुछ स्त्रियाँ भी ऐसी ही थीं। वे घरके सारे कामकाज रुक जावेगा । बलवान दीर्घायु सन्तान होगी,मृत्यु करती थीं । आज कलकी तरह नाजुक न थीं। कम होंगी, रोग कम सतावेंगे और स्त्रियोंकी संख्या इस समय भी उस समयके उत्पन्न हुए.६०-७० पुरुषोंसे कम न रहेगी। वर्षके बूढे वह शक्ति रखते हैं, जो आजकलके जैसा कि आगे बतलाया जायगा जैनसमाजमें नौ जवानोंमें भी नहीं होती। स्त्रियोंकी संख्या कम है और इसका कारण यह जैनसमाजको नाशसे बचानेके लिए सबसे है कि, हमारे यहाँ लड़कियाँ और स्त्रियाँ लड़कों पहले परिश्रम करने और. व्यायाम करनेकी शिक्षा और पुरुषोंकी अपेक्षा अधिक मरती हैं। मरें क्यों मिलनी चाहिए । इन कामोंको छोटा या नहीं ? उनके स्वास्थ्यकी ओर ध्यान ही कहाँ दिया असम्मानका सूचक न समझना चाहिए । आरो- जाता है । उनके साथ बुरा वर्ताव किया जाता ग्यता होनेसे-स्वस्थता होनेसे ही धर्मसाधन हो है, वे स्वास्थ्यनाशक पर्दमें रक्खी जाती हैं, सकता है । अतएव इस विषयकी शिक्षा खास बचपनमें माता बना दी जाती हैं और बीमार तौरसे प्रचलित की जानी चाहिए । स्वास्थ्य- होने पर उनकी दवादारूका यथेष्ट प्रयत्न नहीं रक्षाके मोटे मोटे नियमोंका ज्ञान सबको करा किया जाता । मनुष्य जाति के लिए यह बहुत देना चाहिए। कोई रोग ऐसा नहीं, जो उचित ही लज्जाकी बात है कि वह अपने एक अंगको उपाय करनेसे रोका न जा सके। यूरोपवासि- इतना तुच्छ समझता है और दूसरे अंग पर अपयोंने प्लेग, हैजा, चेचक आदि रोगोंको अपने ना सर्वस्व न्योछावर करके भी सन्तुष्ट नहीं होता। देशसे सर्वथा निकाल दिया है । निर्बलता तरह ४ बाल्य-विवाह । प्राचीन समयमें इस तरहके रोगोंको बुलानेकी निमंत्रणपत्रिका है। देशमें विवाह उस समय होता था, जब वर डाक्टर लोग कहते हैं कि क्षयरोग ( तपे- कन्या दोनों यौवनावस्थाको प्राप्त हो जाते थे दिक) के कीड़े सभी मनुष्यों के शरीरमें प्रवेश और विवाहके उद्देश्यको समझने लगते थे । कर जाते हैं, परन्तु वे तबतक हानि नहीं पहुँचा इधर देशकी परिस्थितियों में बड़े बड़े परिवर्तन सकते, जबतक शरीर बलवान् रहता है। मनुष्य होनेसे कोई ४००-५०० वर्षसे यह बाल्यदुर्बल हुआ कि, इन्होंने उसे यमलोकको भेज विवाहकी प्रथा चल पड़ी है। इस प्रथाने देशको देनेका प्रयत्न किया। अन्य रोगोंके कीड़ों- बड़ी भारी हानि पहुँचाई है । यदि यह न होती का भी यही हाल है । बाल्यविवाह कादि कुप्र- तो आज युक्त प्रान्तमें पन्द्रह वर्ष से कम उम्रकी थायें भी निर्बल मनुष्यों पर अधिक हानि- १,२५९ जैनविधवाओंकी हृदयविदारिणी संख्या कारक प्रभाव डालती हैं । यही कारण है, जो सुननेका दिन न आता । १९०१ से १९११ तक दश वर्षोंमें बाल्य- चौथे कोष्टकको देखनेसे मालूम होगा कि विवाहोंके कुछ कम हो जाने पर भी जैनि- युक्तप्रान्तमें सन् १९११ में ५ वर्षसे कम योंका क्षय पहलेसे भी अधिक हुआ है। क्योंकि इन उम्रकी विवाहिता जैन लड़कियाँ २८, पाँचसे दश वर्षोंमें लोग पहलेसे अधिक दुर्बल और १० वर्ष तककी २५२ और १० से १५ तक की वीर्यहीन हो गये हैं । लेखकको विश्वास है कि १३९३ थीं । इसी तरहसे ५ वर्षसे कमके यदि लोग अपने स्वास्थ्यकी ओर ध्यान देना विवाहित लड़के १५, पाँचसे १० तकके १८१, Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522836
Book TitleJain Hiteshi 1917 Ank 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1917
Total Pages98
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size12 MB
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