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KAROBICILLI ONILIATURE SE जैन लेखक और पंचतंत्र।
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पंचतंत्रके संस्कृत पाठके आधारपर लिखे गये का तामिल ग्रंथ इसी मराठी ग्रंथका शब्दशः हैं और कुछ इस संस्कृत और पंचतंत्रके अन्य अनुवाद है । तंदवरयका ग्रंथ दक्षिण भारतपाठोंके मिश्रित अनुवाद हैं।
के स्कूलोंका सर्वप्रिय ग्रंथ है और इसका __इनमेंसे एक आवत्तिकी संस्कृत बहुत अनुवाद अगरेजीमें हो चुका है। निकम्मी है। यह आवृत्ति दक्षिणी पंचतंत्र मेरे पास एक हस्तलिखित ग्रंथकी एक
और तामिलके एक अथवा कई पाठोंके मेलसे प्रति और भी है । इस प्रतिके स्वामी काशीलिखी गई है । इस आवृत्तिका पता निवासी एक ब्राह्मण हैं । इस प्रतिकी मूल मुझे ताड-पत्र पर लिखी हुई एक विचित्र प्रति तैलंग लिपिमें हैं, अतएव यह ग्रंथ प्रतिसे लगा है, जिसे तंजौर निवासी टी. एस. कर्नाटक देशमें लिखा गया होगा। यह ग्रंथ कुप्पूस्वामी शास्त्रीने स्वर्गीय अध्यापक वोन धर्म पंडितकी रचना है और अपूर्ण है। मन कौसकाको प्रदान किया था और जो यह ग्रंथ संपूर्ण अंशमें नहीं परन्तु सुख्यतः अब लैपजिगकी यूनीवर्सिटी-लाइब्रेरीमें संग्रहीत दोनों अत्यन्त प्राचीन जैन आवृत्तियोंके है । इस वृत्तिमें कई नई कथायें हैं, जिन- आधार पर लिखा गया है। मेंसे कुछ पंचाख्यानकी भिन्न भिन्न जैन- एक ग्रंथ और है, जिसका नाम तंत्राख्यान आवृत्तियोंमें मिलती हैं।
है, (तंत्रख्यायिका नहीं)। इस ग्रंथके तीन अब्बे ड्यूबोइस कृत फ्रेञ्च भाषाका पंच- रूपान्तर आजकल नैपालमें मिलते हैं। तंत्र, जो तैलंग, तामिल और कन्नड भाषाओं- इनमें से एकमें जो सबसे प्राचीन और मूल की तीन प्रतियोंसे मिला कर तैयार किया है केवल कथाकल्लोल है; दूसरेमें उसके गया है, इस संस्कृत आवृत्तिसे बहुत कुछ सिवाय कुछ कथायें नेवारी (नेपाली ?) में हैं। समामता रखता है। क्योंकि कई विशेष कथायें मालूम होता है कि इनमेंसे पहला रूपान्तर इन दोनों ही ग्रंथों में मिलती हैं। दक्षिणसे नैपालमें लाया गया है। चूंकि
उन्नीसवीं शताब्दीमें तंदवरय मदा- इसमें एक स्थान पर तारागोंको देवता माना लियरने मराठी अनुवादसे एक अनुवाद गया है, इस लिए यह निश्चय है कि इसका तामिल भाषामें तैयार किया। यह मराठी कता जैनधर्मानुयायी था । अनुवाद लीथोमें बिना मुखपृष्ठके छपा ब्रह्मा इत्यादि पूर्वीय देशोंमें-दक्षिणी था और दक्षिणी पंचतंत्र, हितोपदेश और पंचतंत्रके तामिल रूपान्तरके अनुवादके अतिदोनों अत्यन्त प्राचीन जैन आवृत्तियों, अर्थात् रिक्त -कई ग्रंथ ऐसे हैं, जो पंचतंत्रके सरलावृत्ति और पूर्णाभद्रकी आवृत्तिके मेलसे आशयको लेकर लिखे गये हैं । यद्यपि इन तैयार किया गया था। तंदवरय मुदालियर- ग्रंथोंके विषयमें बहुत कम मालूम है, परन्तु ।
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