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________________ MAI TARAIIIIIIIII २९० Del जैनहि जितनी मनुष्य आकांक्षा रखता है उतना ही वह मार्ग भी उसे प्रगट हो जाता है। इस बातका उसे मिलता है। मनुष्य क्या हो सकता है भी उसे स्पष्ट ज्ञान हो जाता है कि मैं कहाँसे इसका अनुमान उसकी आकांक्षाओंसे ही आया हूँ और कहाँ मुझे जाना है । किया जा सकता है । किसी वस्तुकी ओर मनको लगाना, मानो पहले उसकी प्राप्तिको निर्दि- विषयोंमें उन्मत्त हुए मनुष्यके लिए कोई ट करना है । जिस प्रकार मनुष्य छोटी छोटी मार्ग सरल और निश्चित नहीं है। उसके आगे चीजोंका ज्ञान और अनुभव प्राप्तकर सकता पीछे बिलकुल अंधकार है । वह क्षणिक सुखोंहै उसी प्रकार बडी बडी चीजोंको प्राप्तकर की जोहमें रहता है और समझने और जाननेके सकता है । जैसे उसने मनुष्यत्वको प्राप्त किया लिए तनिक भी उद्योग नहीं करता । उसका है वैसे ही ईश्वरत्वको प्राप्त कर सकता है। मार्ग अव्यक्त, अनवस्थित, दुःखमय और कंटकमनको ईश्वरकी ओर लगाना इसीकी अत्यंत मय होता है उसका हृदय शांतिसे कोसों दूर आवश्यकता है। रहता है। पवित्रता और अपवित्रता क्या वस्तुयें हैं ? उच्च आकांक्षा रखने वाले मनुष्यके सामने पवित्र विचारोंका नाम पवित्रता है और अप- स्वर्ग और मोक्षका मार्ग खुला रहता है। उसके वित्र विचारोंका नाम अपवित्रता । जैसे मनष्य- पीछे सांसारिक इच्छाओंके पेचदार रस्ते बने के विचार हैं, पवित्र अथवा अपवित्र, उसीके रहते हैं जिनमें वह अबतक चक्कर खाता रहा है। अनुसार वह पवित्र वा अपवित्र कहलायगा । अब वह अपने मनको ज्ञान प्राप्तिमें लगाये हुए दूसरोंके विचारोंसे उसका कोई सम्बंध नहीं। आत्मबोधके लिए उद्योग, करता है। उसका हर एक अपने अपने विचारोंका उत्तरदाता है। मार्ग साफ और निष्कंटक है और उसके हृदयमें यदि मनुष्य यह विचार करे कि मैं दूसरों- शांति और आनंदका अनुभव होने लगा है। के कारण अथवा घटनाओंके कारण अथवा सांसारिक इच्छा रखनेवाले मनुष्य छोटी अपने पूर्वजोंके कारण अपवित्र हैं तो यह छोटी वस्तुओंके पानेके लिए शक्ति भर उसकी भूल है । इस विचारसे वह अपनी भलों- उद्योग करते हैं जो बहुत शीघ्र नष्ट हो जाती को दूर नहीं कर सकता, अपनी बटियोंको हैं और जिनका चिन्ह तक भी शेष नहीं रहता। कम नहीं कर सकता, किंतु ऐसे विचारों- परंतु इसके विपरीत उच्च आकांक्षा रखने से सारी पवित्र आकांक्षायें नष्ट हो जाती हैं वाले मनुष्य धर्म, ज्ञान, बुद्धिसे सम्बन्ध रखने और मनुष्य इन विषय वासनाओंका दास बाली बड़ी बड़ी चीजोंक हासिल करनेके लिए बन जाता है। भरसक उद्योग करते हैं जो कभी नष्ट नहीं जब मनुष्य इस बातका अनभव करता होती, किंतु मनुष्य जातिके उत्कर्ष और सुधारके है कि मुझमें जो जो त्रुटियाँ और अपवित्रतायें लिए सदैव स्मारकरूप रहती हैं। हैं उन्हें मैंने ही स्वयं उत्पन्न किया है और मैं जिस प्रकार एक व्यापारी निरंतर उद्योग ही उनका कर्त्ता और उत्तरदाता हूँ तब उसे करते रहनेसे अपने व्यापारमें सफलता प्राप्त उनपर जय प्राप्त करनेकी आकांक्षा होती है। करता है, उसी प्रकार एक ज्ञानी - पुरुष उच्च और किस तरहसे उसे सफलता हो सकती है आकांक्षा और उद्योगसे आत्मोन्नतिमें सफलता Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522826
Book TitleJain Hiteshi 1916 Ank 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1916
Total Pages48
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size6 MB
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