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________________ AATALIM म Cum A LAMILLITERALLAHARIA आचार्य सिद्धसेन । initititiminiliffinfunny फिर पाठक इन उल्लेखोंसे समझ सकते हैं आग्रही बत निनीषति युक्तिं, कि उच्चकोटिके विद्वान् सांप्रदायिक दुराग्रह तत्र, यत्र मतिरस्य निविष्टा । के फंदेमें नहीं फंसे रहते हैं । वे सत्यके पक्षपातरहितस्य तु युक्तिउपासक होते हैं, अतः उन्हें जहाँ कहीं ___ यंत्र, तत्र मतिरेति निवेशम् ॥ सत्य दिखाई देता है, वे झट उसे अपना लेते हैं । वे सत्यका प्रकाशन और गुणी पुरुषोंका गुणगान सदा ही किया करते हैं। सम्पादककीय नोट-यद्यपि अभी इस - बातके सिद्ध करनेके लिए और भी पुष्ट प्रमाणोंकी जो व्यक्ति जितनी योग्य होती है उसका जरूरत है कि आदिपुराण और हरिवंशपुराणमें जिन उतना आदर, वे अवश्य करते हैं। चाहे वह सिद्धसेनका उल्लेख किया गया है वे न्यायावतारके कर्ता सिद्धसेनदिवाकरसे भिन्न नहीं हैं। अभी तक इससे जिनसेन जैसे उच्चतर विद्वान् सिद्ध र यह बात केवल अनुमानसे सिद्ध की गई है। खोज नेसे दिगम्बरसस्प्रदायके ग्रन्थों में शायद इनका विशेष सेन दिवाकर जैसे जैन-प्रभावककी-श्वेतांबर परिचय मिल जाय और उससे सिद्ध हो जाय कि वे दिगम्बरप्रदायके ही थे । तो भी, जब तक ऐसा सिद्ध न हो जाय तब तक मुनि महाशयका यह कथन ठीक जान पड़ता है कि सिद्धसेन दिवाकर उस समय सिद्धसेनकी एक कृतिहीको-कल्याणमादर- हए हैं जब जैनधर्ममें दिगम्बर और श्वेताम्बर भेद स्तोत्रको-दिगंबर समाजने अपना लिया है। ही न हुए थे। विक्रमकी सभाके नौ रत्नोंमें जिन वह उसका नित्य पाठ करती है। इसके 'क्षपणक' का उल्लेख है, वे 'सिद्धसेन दिवाकर' को छोड़ अन्य नहीं हो सकते । सिद्धसेनके उपलब्ध अंतमें जो कुमुदचंद्र नाम है वह दिवाकर प्रथोंमें भी शायद कोई ऐसी बात नहीं है जिसे हीका है,यह प्रमाणोंसे निश्चित हो सकता है। केवल दिगम्बर या श्वेताम्बर ही मानते हों। उनके पाठक, हमारे जो विचार थे वे हमने ग्रन्थ दोनों सम्प्रदायका एकरूपसे कल्याण कर सकते हैं। संभव है कि उनके ग्रन्थोंका प्रचार श्वेताम्बर सम्प्रदायमें ही विशेष रहा हो और इस कारण वे श्वेताम्बर सम्प्रदायके ही आचार्य गिने जाने लगे हों। सिद्ध हो जाय कि पुराणस्मृत सिद्धसेन, इधर दिगम्बरोंमें उनके ग्रन्थोंका प्रचार न रहनेसे वे उन्हें भूल गये हों और इस कारण उनके साहित्यमें दिवाकर सिद्धसेनसे भिन्न हैं तो हमें इस उनका विशेष उल्लेख न मिलता हो-केवल भगवज्जिमें कोई आग्रह नहीं । हम अपने विचारको नसेन जैसे परिचितोंने ही उनका स्मरण किया हो। परिवर्तित कर सकते हैं। विद्वान् वही कह- यह भी संभव है कि भगवज्जिनसेनने उनके अविलाता है जो यक्तिके अनकल अपने विचारों- रोधी ग्रन्थोंपरसे उन्हें दिगम्बर समझकर, अथवा श्वेताम्बर समझकर भी — गुणाः पूजास्थानं गुणिषु को चलाता है, न कि विचारानुकूल युक्ति- न च लिङ्गं न च वयः ' की उदार नीतिके अनुसार को खींचनेवाला । हरिभद्रसूरिने लिखा है कि- स्मरण किया हो । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522822
Book TitleJain Hiteshi 1916 Ank 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1916
Total Pages74
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size9 MB
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