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________________ ____३३२ नदीकी तपी हुई बालूमें, इस वेगसे बहनेवाली वैतरणीके आवर्तभीषण किनारेमें, इस दुस्तर पारावारके प्रथम तरंगाघातमें और कौन मेरी रक्षा कर सकता है ? बड़े वेगसे जीवननदीमें तूफान आ रहा है, चारों ओर घोर निराशाका अंधकार है ! हे नाथ ! हे आर्तत्राणपरायण | चारों ओर घोर अंधकार है ! मेरी यह जीर्ण जर्जर नौका पापके बोझसे दबी जा रही है, भगवन् , तुम्हीं इसे भवसागरके पार लगानेवाले कर्णधार हो ! मुझे आपहीका भरोसा है। आपके सिवा और कोई रक्षा नहीं कर सकता। जगदीश, त्राहि ! त्राहि ! ( चौबेके चिरेसे उद्धृत ।) जैन लाजिक । . ( अंक १२, भाग ९ से आगे।) ९२. प्रमाण-नय-तत्त्वालोकालंकारमें निम्नलिखित आठ परिच्छे है:-(१) प्रमाण-स्वरूप-निर्णय; (२) प्रत्यक्ष-स्वरूप-निर्णय; (३ स्मरण-प्रत्यभिज्ञान-तुर्कानुमान-स्वरूपनिर्णय; ( ४ ) आगम-प्रमाण स्वरूप-निर्णय; (५) विषय स्वरूप-निर्णय; (६) फल-प्रमाण-स्वरू पाद्याभास-निर्णय; (७) नयात्म-स्वरूप-निर्णय; (८) वादि-प्रतिवादनिर्णय । यह ग्रंथ माणिक्यनंदिकृत परीक्षामुखसूत्र, अकलंककृत न्यायविनिश्चय, और सिद्धसेनदिवाकरकृत न्यायावतारके ढंग पर लिखा गया है । अतएव मैं समान बातोंको न लिखकर केवल विशेष लक्षणोंका ही वर्णन करूँगा। ९३. इसमें प्रमाणकी परिभाषा यह लिखी है कि प्रमाण वह ज्ञान है जो स्वस्वरूप और अन्य पदार्थोके स्वरूपका • निर्णय करे । इन्द्रिय और इन्द्रियग्राह्य पदार्थोंका पारस्परिक सम्बन्ध प्रमाण नह Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522795
Book TitleJain Hiteshi 1913 Ank 06 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1913
Total Pages148
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size13 MB
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