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________________ २४८ - कुछ कालतक महावीर और बुद्धके सिद्धान्त और धर्म एक दूसरेके बराबर वराबर (समानान्तर रेखाओंमें ) चलते रहे । यह भले प्रकार निरित किया जा सकता है कि महावीरका साक्षात् शिष्य और उनकी शिक्षाओंको संग्रह करनेवाला इन्द्रभूति गौतम, बुद्धधर्मके प्रसिद्ध संस्थापक बुद्धगौतम तथा न्यायसूत्रके कर्ता ब्राह्मण अक्षपाद गौतमका समकालीन था । हम देखते हैं कि बौद्धोंके 'त्रिपटिक' जैसे धर्मग्रंथोंमें जैनधर्मके सिद्धान्तोंका उल्लेख मिलता है और जैनियोंके धर्मग्रंथोंमें, जिन्हें 'सिद्धान्त ' कहते हैं बौद्धोंके सिद्धान्तोंका विवेचन (गुणदोषविचार ) पाया जाता है। सर्वसाधारणतक पहुँचने तथा अपने उच्च सिद्धान्तोंका मनुष्यसमूहमें प्रसार करनेके लिए इन दोनों महान् शिक्षकोंने, अपनी शिक्षाके । द्वारस्वरूप, उस समयकी दो अत्यन्त लोकप्रिय और प्रचलित भाषाओंको पसंद किया था-बुद्धने पालीभाषाको और महावीरने प्राकृत भाषाको । इस प्रतिवादके विषयमें कि पाली और प्राकृत भाषायें इतनी प्राचीन नहीं हो सकती हैं कि उनका अस्तित्व सन् ईसवीसे ६०० वर्ष पहले माना जाय, इतना कहा जा सकता है कि ये भाषायें या स्पष्टतया इनकी वे खास शकलें ( आकृतियाँ), जिनमें महावीर और बुद्धने शिक्षा दी, उस पाली और प्राकृत ग्रंथोंकी भाषासे जो हम तक पहुँची है जरूर ही बहुत भिन्न थीं । और यह बात इस मामलेसे आसानीके साथ स्पष्ट की जा सकती है कि उनकी शिक्षाकी भाषायें, जो हम तक लिखित रूपसे नहीं किन्तु मौखिक रूपसे पहुँची हैं दोनों भाषाओंके साधारण परिवर्तनोंके साथ साथ परिवर्तित होती रही हैं। ___ सन् ईसवीकी पहली शताब्दीमें बौद्धधर्म दो शाखाओंमें विभक्त हो गया, जिनको 'महायान' और 'हीनयान, अर्थात् बड़ा वाहन और Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522794
Book TitleJain Hiteshi 1913 Ank 04 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1913
Total Pages150
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size14 MB
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