________________
-
न विस. क्रियोद्धारक पंन्यास सत्यविजय गणिने क्रिया उद्धार करके शासनको एक प्रकार से वृद्ध अवस्था में गये हुए को फिर से युवक बना दिया। पर आखिर तो वृद्ध अवस्था ही थीन ?
नि. सं. १५०८ में शासन भंझक महोदय (?) श्रीमान् लोकाशाह और साधुओका द्वेषी कडुआशाह का आविर्भाव हुआ। अपराध विशेष से गुरु महाराज के द्वारा तिरष्कृत हो जाने पर यवनोंकी सहायतासे आत्मकल्याण का मुख्य साधन मूर्तिपूजा सामायक पोषध प्रत्याख्यान आदि २ क्रियाओंका निषेध करके अपने नामसे पृथक पन्थ चला दिया। सद भाग्व से प्रातःस्मरणीय आचार्य प्रवर श्री हीरसूरीश्वरजी महाराज तथा श्री आनन्दविमलसुरि आदि जैसे महापुरुषोने अपनी विश्वविजयी प्रतिभाद्वारा शासनकी सुव्यवस्था की, भूले हुए प्राणियों को सत्यमार्ग पे लाये। खूद लौकाशाहके अनुयायी कहलाने वाला वी. मो. शी. अपनी ऐतिहासिक नोंध में भी लिखते है कि पू. मेघजी स्वामि आदि ५०० साधु लौकागच्छ को छोड़ कर विजयहीरसुरीश्वरजी के शिष्य हो गये। ___ बचे हुए लोगोंने लौकाशाहने जिन बातों का निषेध किया था उन्ही स्वीकार .. करके लौकागच्छ नामक एक सम्प्रदाय बना लिया। वृद्ध अवस्था के विकृतने यही तक सन्तोष नही किया लौकागच्छ में से भी लवजी और धर्मशी नामके निन्हवों ने पुनः मूर्ति पूजा से विद्रोह करके कुलिंग धारण करके ढूंढिया पन्थ चलाया जिसको आज स्थानकवासी तथा बाई टोले कहते है। शासनकी वृद्ध अवस्था के प्रभावसे स्थानकवासीयों में से भी शासन द्रोही स्वामि भिखुजीने तेरह पन्थ नामक सम्प्रदाय अलग निकाली। इन्होंने तो यहां तक दुःसाहस कर डाला कि-मानो इस वृद्ध शासन का खून ही कर दिया हो, भगवान महावीर स्वामि को भी चूका (पापी) कहने में लज्जित नहीं हुए। दया दान आदि धर्म के मूल तत्त्वों में भी पाप बताने लग गये। इस प्रकार इन २५०० वर्षों में महावीर के शासनकी जो दुरदशा हुई और हो रही है। यह देख कर ऐसा कौन सहृदयी होगा कि जिसके आंखों से आंसू नही आते हो ? पर क्या किया जाय संसारका स्वभाव ही परिवर्तनशील है। खैर अब भीः जीनेश्वर प्रभुसे प्रार्थना हो कि कोई न कोई महापुरुष जन्म लेवें और शासन को फिर से नया रुप देवें। इत्यलम् મુદ્રક-હીરાલાલ દેવચંદ શાહ. “શારદા મુદ્રણાલય” જુમાનજીદ સામે–અમદાવાદ પ્રકાશકઃ | ભેગીલાલ સાંકળચંદ શેઠ, “જેનધર્મ વિકાસ ઓફિસ જનાચાર્ય
| વિજયનીતિસૂરીશ્વરજી વાંચનાલય. ૫૬/૧ ગાંધીરેડ-અમદાવાદ