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________________ સંસાર પરિવર્તનશીલ છે. ४०३१ , १२॥ वर्ष तक घोर तपस्या करके प्रभु महावीरने शासन (तीर्थ) रूपी दिव्य शरीरका निर्माण किया था। उस समय यह शासन अत्यन्त कान्तिमय, मनोहर और बीजके चन्द्रवत् बाल्य अवस्थामें था। बड़े बड़े राजा महाराजा चक्रवर्ति वासुदेव आदि इनके शासनमें आकर अपने को परम भाग्यशाली समजते थे। सर्वस्व अरपण करके भी इस शासनकी सेवा करते थे। साक्षात् देवलोक जैसे इन्द्रीय जनित सुख भोगने वाले श्री शालिभद्र, राजपुत्र मेघकुमार, श्री जम्बुकुमार जैसे पुन्यशाली आत्मा कंचनवरणी कोमलांगी इन्द्राणियों को लज्जित करने वाली स्त्रियोंको भी ठुकराकर इस शासनकी शरण लेते थे । परिवर्तन शील के नियमानुसार शासन जब युवावस्था में आया तब तक तो इनका शरीर इतना हृष्टपुष्ट और विस्तिर्ण क्षेत्रमें हो गया कि इसरोंको ठहरने का अवकाश भी नही मिल सकता इनके सेवक भी ऐसे हुए कि इनके स्वास्थ्यकी स्क्षा करते हुए उत्तरोत्तर उन्नति ही करते रहे जैसे ओशवंश संस्थापक श्री रत्नप्रभसूरि सम्राट सम्प्रति को प्रतिबोध देने वाले आर्य सुहस्ति सुरि दुष्कालके कारण संघकी रक्षा करनेवाले आर्य वज्रस्वामि आदि महापुरुषोने अपनी शक्ति द्वारा शासनकी अपूर्व सेवा की जिससे सर्वत्र महावीर के सिद्धान्त का प्रचार हो गया। एसा होना स्वमाविक ही था क्योकि अब तक शासन की बाल अवस्था से युवा अवस्था ही थी। ____ पर कहा है कि युवावस्था के ढलते ही इसमें भी विकार उत्पन्न होने लग गया फल स्वरूप वीरातू ६०९ में निश्चयनय को ही पकड़ कर जितकल्पी की नकल करने वाले कुछ बन्धुओने शासन के एक अंग को पृथक रुप कर डाला और सूत्र साहित्य भी सब नये बनाकर दिगम्बर सम्प्रदाय के नामसे अपनी अलग खिचडी पकाने लग गये। शासन सेवक महाप्रभावक आचार्योने इस बिमारी को नष्ट करने का भर-सक प्रयत्न किया। और शासनरक्षा एवं शासन्नोन्नति के ध्येयसे पृथक पृथक समुदाय की व्यवस्था की। फल यह हुआ कि भिन्न२ गच्छ होते गये भिन्न२ समाचारियें होती गई । “वाड़ खेत को खाय" जैसी स्थिती हो गई। फिर भी शासनरक्षा-एवं उन्नतिमें सबका एक ध्येय रहा, अतः यह यह कम सौभाग्य की बात नही है। कुछ समयानन्तर शासन वृद्ध अवस्था आने लगा। आप जानते हैं कि वृद्ध अवस्था मे स्थिती कैसी हो जाती है। ठीक यह स्थिती हमारे शासनके लिये भी होने लगी। भिन्न २ गच्छ एवं समाचारी होने से स्वच्छंदता बढ़ती गई, फल स्वरुप शैथल्यताने अपना राज्य जमाया, सद्भाग्यसे कलिकाल सर्वज्ञ भगवान् हेमचन्द्राचार्य, उपाध्याय यशोविजयजी जैसे बड़े बड़े प्रभावशाली शासनसेवकोंका आवीरभाव हुआ। और सर्वत्र शासनकी उन्नति के प्रयत्न किये।
SR No.522524
Book TitleJain Dharm Vikas Book 02 Ank 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmichand Premchand Shah
PublisherBhogilal Sankalchand Sheth
Publication Year1942
Total Pages38
LanguageGujarati, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Dharm Vikas, & India
File Size9 MB
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