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अपभ्रंश भारती 15-16
(1.10)
तं णिसुणिवि जणणिहे दुक्खहउ उक्खय विसाणु जह मत्तगउ। दंडाहउ जह भुअंगु वलइ पसरंतु रोसु पुणु पुणु' खलइ। करु करिहि णिसामिवि परिभमइ रोसाणलु हियडइ विज्झवइ। चिंतइ कुमारु वि तो विवण मणु कह ताए सहु आढत्तु रणु।
5.
जासु वि घरि इक्कहि वीसमिउ किउ तासु वि विरुवउ ववहरिउ। किं पुणु जणेरु पिय परमगुरु कह तह सवडम्मुहु वूढ करु। कहि एहइ संकडि हउं पडिउ नवि रिउ पवर चक्के समोवडिउ।
असि फरसु कुंत भड थड निवहो नर सिर कवंध नच्चंतयहो। उद्धाइवि रहस समुन्भरिउ नवि हरिय गय कुंभिहि उवडिउ। एत्तहि पिउ एत्तहे मायडिया विहि किं समाणु मइ थट्टि किया।
10.
घत्ता- परिहउ किउ जइ वि सहमि पिउं तो फुडू जणणिहि होइ विपत्ति।
हय जम्महो दुक्खिय कम्महु तो महु विहलिय जग्गिय रति ।।10॥
(1.11)
चिंतेवि एम हरिसेणु मणि गउ चंपारन्नि पइट्ठ खणि। वहु तरु गिरिकंदरि णिज्झरिहि कप्फाडिहि लयण' लायहरेहि। विल्लीलय तरु वावय गहणु नवि सूरु न दीसइ नवि गयणु। वम्मिय सिह रुग्गय नयवि अहि फणिमणि उज्जोए भमइ महि।
कत्थइ वहु वानर वुक्करहिं कत्थइ मइंद सय गुंजरहि। कत्थइ दिसि धूम धार तउ तरु संघहो ट्ठिय लग्गु दउ। कत्थइ भुंडिणि दाढालएहि वाराह खयाल लयालएहि। कत्थइ करिवर पसरु पहु कडमड करंति' तरुवरह वहु।
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कत्थइ अजयर सुंसुं करिउ कत्थइ तरच्छू लल्लुय रडिउ। कत्थइ गिरि तरु मूलेहि सहिउ आरण्ण महिस सिंगु ल्ललिउ।