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________________ अवहट्ट अथवा पुरानी हिन्दी साहित्य - पटल पर एकछत्र राज करती रही । यह अपभ्रंश भाषा और उसकी संवेदना के पारस्परिक सामंजस्य के कारण ही संभव हो सका।" "अपभ्रंश के कवियों की संवेदनाएं समाज के व्यापकतर छोर को छूती हैं। ये वे कवि नहीं हैं 'जिन्हें न व्यापे जगत गति' । अपभ्रंश की कविता की जड़ें अपने सामाजिक परिवेश में गहरे स्तर तक उतरती हैं। मर्म को छूती हैं। सामाजिक चेतना की अभिव्यक्ति देती हैं । सम्पूर्ण सामाजिक-राजनीतिकआर्थिक तथा सांस्कृतिक परिवेश का जायजा देती हैं। जहाँ भद्रजनों के भावों की ऊँचाई मापती हैं वहीं आम जनता के विभिन्न रूपों की पहचान का प्रयास भी करती हैं । " जिन विद्वान लेखकों ने अपनी रचनाएं भेजकर अंक प्रकाशन में हमें सहयोग किया हम उनके आभारी हैं। संस्थान समिति, सम्पादक मण्डल एवं सहयोगी कार्यकर्ताओं के भी आभारी हैं । मुद्रण हेतु जयपुर प्रिन्टर्स प्रा. लि., जयपुर धन्यवादार्ह है । डॉ. कमलचन्द सोगाणी
SR No.521855
Book TitleApbhramsa Bharti 1995 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka, Gopichand Patni
PublisherApbhramsa Sahitya Academy
Publication Year1995
Total Pages110
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Apbhramsa Bharti, & India
File Size8 MB
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