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________________ अपभ्रंश-भारती 5-6 3. वही, सूत्र 343 में उद्धृत, पृ. 593 ।। 4. वही, सूत्र 344 में उद्धृत, पृ. 594 । 5. वही, सूत्र 352 में उद्धृत, पृ. 596 । 6. वही, सूत्र 357 में उद्धृत, पृ. 597 । 7. वही, सूत्र 396 में उद्धृत, पृ. 608 । 8. हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग, पृ. 312, डॉ. नामवर सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पंचम, परिवर्धित संस्करण 1971 । 9. हेमचन्द्राचार्यविरचितं प्राकृतव्याकरणम् सूत्र 414 में उद्धृत, पृ. 613 । 10. वही, सूत्र 396 में उद्धृत, पृ. 608 । 11. वही, सूत्र 418 में उद्धृत, पृ. 614 । 12. वही, पृ. 615 । 13. वही, सूत्र 419 में उद्धृत, पृ. 616 । 14. वही । 15. वही, सूत्र 422 में उद्धृत, पृ. 617 । 16. वही, पृ. 618 । 17. वही, पृ. 619 । 18. वही। 19. वही, सूत्र 432 में उद्धृत, पृ. 623 । 20. वही, सूत्र 444 में उद्धृत, पृ. 626 । 21. वही, सूत्र 424 में उद्धृत, पृ. 620 । वही, सूत्र 431 में उद्धृत, पृ. 622 । सूत्र 345 में उद्धृत, पृ. 594 । सूत्र 351 में उद्धृत, पृ. 595 । सूत्र 356 में उद्धृत, पृ. 596 । 26. वही, सूत्र 357 में उद्धृत, पृ. 597 । 27. वही। 28. वही, सूत्र 364 में उद्धृत, पृ. 598 । 29. वही, सूत्र 379 में उद्धृत, पृ. 603 । 30. वही। 31. वही, सूत्र 386 में उद्धृत, पृ. 605 ।
SR No.521854
Book TitleApbhramsa Bharti 1994 05 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka, Gopichand Patni
PublisherApbhramsa Sahitya Academy
Publication Year1994
Total Pages90
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Apbhramsa Bharti, & India
File Size7 MB
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