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अपभ्रंश-भारती-3-4
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देश के दार्शनिकों और मनीषियों ने जीवन की एक समग्र, समृद्ध और सम्पूर्ण प्रस्तावना प्रस्तुत करनी चाही। यही हिन्दू संस्कृति और धर्म का मूल चरित्र है। ___ आठवीं शती के अंत से हिन्दी साहित्य के बीज अंकुरित दिखाई देते हैं। और इस अंकुरण के साथ-साथ अभूतपूर्व राजनीतिक और धार्मिक घटनाएं भी घटती हैं। हिन्दी साहित्य के शुरूआत के पूर्व हिन्दू धर्म ग्रन्थ, मनु और याज्ञवल्क्य की स्मृतियाँ, सूर्यादि पाँचों सिद्धान्त ग्रन्थ, चरक और सुश्रुत की संहिताएं, न्यायादि छहों दर्शन, सूत्र, प्रसिद्ध पुराण, रामायण, महाभारत के वर्तमान रूप, नाट्यशास्त्र, पतंजलि का महाभाष्य आदि की रचना ईसवी सन् के दो-ढाई सौ वर्ष इधर-उधर की मानी जाती है, पर इन्हें अप्रामाणिक तो नहीं माना जाता। निश्चय ही इनका प्रचार-प्रसार काफी लम्बे अर्से तक होता रहा है। इन्हीं का फल है कि अश्वघोष, कालिदास, वराह मिहिर, कुमारिल, शंकर आदि संस्कृत के अनमोल रत्नों ने भारतीय विचारधारा को अभिनव समृद्धि से समृद्ध किया। यह समृद्धि हिन्दी साहित्य को प्रमाणित किए बिना कैसे रह सकती है। सातवीं शती तक बौद्ध धर्म का प्राबल्य था, पर सभी जनता बौद्ध धर्मानुलंबी नहीं थी। सत्य तो यह है कि लोक के सामाजिक जीवन पर इसका प्रभुत्व कम था। वे बौद्ध संन्यासियों का सम्मान अवश्य करते थे और तद्नुरूप अपने लोक-परलोक के विषय में सोचते थे। आज भी भारतीय गृहस्थ परस्पर विरोधी मतों के माननेवाले साधुओं की तथा भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय के भिन्न-भिन्न प्रकृति के देवताओं की पूजा करता है। आज भी वह मन्नत के लिए मंदिर भी जाता है और मजार पर भी जाता है। मठों के संन्यासियों से दुआ लेता है, मौलवियों के तंत्रमंत्र का प्रयोग करता है। ज्योतिषियों के बताए उपाय भी करता है। शंकराचार्य के तत्ववाद की पृष्ठभूमि में बौद्ध तत्ववाद अपना रूप बदल कर रह गया। बौद्ध मठों ने शैव मठों का रूप लिया
और आज भी इन मठों के महंतों की पूजा होती है। इसी काल में बौद्ध धर्म की तांत्रिक साधना, मारण, मोहन, वशीकरण और उच्चाटन जैसी रहस्यपूर्ण विधाओं का भी जनसामान्य में प्रभाव फैला। मुसलमानी आक्रमण से समान रूप से त्रस्त पौराणिक धर्म इसलिए बच गया कि उसका संबंध उन दिनों के समाज से था और बौद्ध धर्म इसलिए नष्ट हुआ कि उसका संबंध बिहारों से था। नवीं और दशवीं शती में शैव और बौद्ध साधना के सम्मिश्रण से नाथ-पंथी योगियों के सम्प्रदाय का अभ्युदय हुआ। यह सम्प्रदाय कालक्रम में हिन्दी भाषी जन-समुदाय को बहुत दूर तक प्रभावित कर सका था। कबीर, सूर, जायसी की रचनाएं इसकी तत्युगीन शक्ति-सामर्थ्य और प्रभाव को आत्मसात किए हुए हैं।
"सन् 1324 में तिरहुत का एक राजा मुसलमानों से खदेड़ा जाकर नेपाल पहुँचा, वह अपने साथ अनेक पंडितों और ग्रंथों को भी लेता गया। इसके द्वारा ब्राह्मण धर्म का जो बीजारोपण हुआ वह आगे चलकर विकाशसील सिद्ध हुआ। परवर्ती राजा जयस्थिति ने इन्हीं ब्राह्मणों की सहायता से समाज का पुनः संगठन किया।''2 नेपाल के गोरखा लोगों ने अपने प्राचीन धर्म को फिर से ग्रहण किया, किन्तु नेवारी बौद्ध ही रहे । पर नेपाल में बौद्ध और हिन्दू धर्म में शत्रु-दृष्टि नहीं रही। वहाँ बुद्ध शिव ही माने गये । नेपाली बौद्धों का स्वयं का पुराण पशुपतिनाथ की पूजा को ही बुद्ध की पूजा मानता है। संभवतः काशी और मगध के प्रांतों में भी अंतिम दिनों में बौद्ध और पौराणिक धर्मों का पारस्परिक संबंध रहा है।