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२५४] શ્રી જેને રાત્ય પ્રકાશ
वर्ष १२ युक्तिसंगत है । विमल मंत्री सलोकेकी पद्य संख्या तो (नं. १७ में) १११ ही बतलाई है।
४. लेखमें शलोकोंको संख्या एवं परिचय दिया गया है उसमें भी गड़बड़ी है। जैन गुर्जर कविओ भा. ३ से सूची देते हुए अंतमें अनुक्रमणिकामें अनुल्लिखित २ अन्य शलोकोंको समिालित करने पर कुल संख्या १६ बतलाई गई है पर वास्तवमें उनको सम्मिलित न करने पर भी जैन साहित्यनो संक्षिप्त इतिहाससे उद्धत सूचीमें नीचे की सूचीसे २ शलोके अभिन्न है अतः वैसे ही संख्या १६ हो जाती है। उक्त जुठा तपसी और लोकशाह सिलोके को मिलानेसे वास्तवमें संख्या १८ हो जाती है । आगे चलकर सिद्धाचल सलोकाका उल्लेख करके भी उसे गणनामें छोड दिया है, अतः आपने कुल संख्या २२ बतलाई यह २५ हो जाती है।
५. भरत-बाहूबली शलोकाका रचना समय १७९५ सही नहीं है, वास्तवमें इस कृतिमें रचनासमयका निर्देश है ही नहीं। जैन साहित्यनो संक्षिप्त इतिहासमें इसी कविके नामसे प्रकाशित विमल मेतानो सलोकोका रचनाकाल भूलसे भरतबाहूबलि सलोकेके रचनाकालके रूपमें लिख दिया गया है।
६. जैन गुर्जर कविओ भा. ३ तो आपने देख लिया, पर उसके दूसरे भागको भी टटोलनेका श्रम किया होता तो निम्नोक्त २ शलोके 3 और मिल जाते ।
१ विमल मेतानो सलोको गा. ११७ उदयरत्न सं. १७९५ खेड़ा।
२ शंखेश्वर सलोको गा. ५३ उदयरत्न सं. १७५९ वै.व.६। ७. विनीतविमल रचित आदिनाथ सलोको और अष्टापद सलोकोको आपने एक ही -अभिन्न मान लेनेकी भी भूल की है । जैन गुर्जर कविओ भा. २ के पृ. ३८३में आदिनाथ सिलोकेके आदि अन्तके पद्य दिये हैं उनसे भा. ३ पृ. १३४५में उन्धृत अष्टापद शलोकेके आदि अन्तके पद्य सर्वथा भिन्न ही हैं। दोनोंका रचनाकाल भी भिन्न भिन्न है। आदिनाथ सलोंकोकी रचना विजयप्रभसूरिके राज्य (सं. १७३२ पूर्व)में हुई है, तब अष्टापद शलोकेकी विजयरत्नसूरिके समय (१६३३ पीछे) में हुई है।
८. लेखमें उल्लखित २२ श्लोकोगेसे 'मोटे भागे अपसिद्ध' लिखना भी सही नहीं है। इनमेंसे ८ तो भीगसी माणेकके प्रकाशित शलोका संग्रह में प्रकाशित हो चुके है एवं इनका जै. गु. क.में मुद्रित चिह्न भी दिया हुआ है। लोकाशाह, कोधादि ५, सिद्धाचल सिलोका, शालिभद्र सिलोका एवं हीरविजयसूरि सलोका प्रकाशित होनेका लेखमें उल्लेख ही है । अत: २५में १७ अर्थात् पौने तो मुद्रित ही सिद्ध होते हैं।
३. भाग २ में जिनविजयरचित नेमि सलोकेका भी उल्लेख है पर वह भा, ३ में उल्लिखित मोतीभावाला ही है।
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