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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ५४ १२ ] નિર્માત તત્વલોક [४२३ अर्थ में उस श्रुत चारित्र धर्म को पूर्ण करने में प्रथम अनेक लौकिक धर्म को भी स्वीकार करना ही पड़ता है, क्यांकि किसी वृक्षके पूर्ण विकास के लिये प्रथम उसकी जडका मजबूत होना अत्यन्त आवश्यक है। लौकिक धर्म लोगोंके आचरणोंको सुधारनेवाला है इसी लिये स्थानांगसूत्र के दशमें स्थान में दश प्रकार के धर्म बतलाये हैं, जैसे "गामधम्मे, नगरधम्मे, रदधम्मे, पाषण्डधम्मे, कुलधम्मे, गणधम्मे, संघधम्मे, सुयधम्मे, चरित्तधम्मे, अस्थिकायधम्मे ।" -[ स्थानाङ्गसूत्र, स्थान १०] अर्थात् प्रामधर्म, नगरधर्म, राष्ट्रधर्म, पाखण्डधर्म, कुलधर्म, गणधर्म, संघधर्म, श्रुतधर्म, चारित्रधर्म, अस्तिकायधर्म ये दश प्रकारके धर्म कहे गये हैं। इन प्रत्येक धांकी विशद विवेचना पृथक् पृथक शास्त्रकाराने की है। कहने का तात्पर्य यह है कि धर्मका क्षेत्र बहुत विशाल है, धर्मकी व्याख्या अत्यन्त विशद है, किन्तु धर्म के विशेष व्याख्यान को-विशेष महत्त्वको अपने संकुचित हृदयसे नहीं समझ कर बहुत लोग शास्त्रअनुमोदित माता पिता गुरुजनादि को सेवा का धर्म नहीं मानते, ऐसे व्यक्ति उत्सूत्रभाषी हैं और शास्त्र के रहस्योंको नहीं जानते हैं। अतः बुद्धिमाना को चाहिये कि मातापिताका सेवामें पाप कहने वालों के उत्सूत्र भाषणको किसी तरह भी ध्यानमें नहीं लायें, इसीम सर्वथा भलाई, सुखशान्ति और आनन्दमंगल है अर्थात् शास्त्रानुमोदित आगमप्रमाणपूर्ण सम्यगज्ञान दर्शन चारित्र धर्म है, श्रुत चारित्र धर्म है, और दान, शील, तप, भावना, परोपकार, जीवक्या, कृतज्ञता, मातापिता-गुरुजन-साधु सन्त आदिकी सेवा धर्म का ही अंग है अर्थात् धर्म है। इस धर्मके पालन करने में निःसन्देह सुख है, शान्ति है और कल्याण है। - इस तरह धर्मक सुविस्तीर्ण अभिप्राय को, धर्म के गंभीर अर्थको और धर्मके सूक्ष्मतम तत्त्वोंको नहीं समझने क कारण कितने लोग शास्त्रसे विरुद्र धर्मकी प्ररूपणा करते हैं, धर्मके वास्तविक अर्थका अनर्थ करते हैं, कल्पतरकल्प धर्मवृक्ष पर कुठाराघात करते हैं जैसे-भ्रमकार जीतमलजीने भ्रभ० के पृष्ठ ४८ पर लिखा है कि " अठे दश धर्म दश स्थविर कहा, पिण सावध निरवध आलखाणा, अने दश दान कह्या ते पिण सावध निरवध पिछाणणा । धर्म अने स्थविर कहा छ पिण लौकिक लोकोत्तर दोन छै जिम जम्बूद्वीपपन्नत्ति में तीन तीर्थ कह्या मागध वरदाम प्रभास पिण आदरवा योग्य नहीं तिम सावध धर्म स्थविर दान पिण आदरवा योग्य नहीं सावध छाड़वा योग्य छे." ___आपके इस अपलाप का असली अभिप्राय यह है कि श्रुत और चारित्र धर्म के अर्थात् आपकी राय में संवर और निर्जरा धर्म के अलावा प्रामादिक आठों धर्म सावध हैं यानी प्रामादिक आठों धर्म को आप पाप बतला रहे हैं, मगर श्रीमानजी को यह नहीं सझा कि प्रामावि धर्म के बिना श्रुत-चारित्र धर्म का पालन कैसे हो सकेगा और न यही समझ पाये कि त चारित्र के अतिरिक्त यदि आठों धर्म पाप हैं तो दिव्यदर्शी ने पृथक पूर्वक नाम For Private And Personal Use Only
SR No.521624
Book TitleJain_Satyaprakash 1946 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJaindharm Satyaprakash Samiti - Ahmedabad
PublisherJaindharm Satyaprakash Samiti Ahmedabad
Publication Year1946
Total Pages40
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Jain Satyaprakash, & India
File Size21 MB
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