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३२२] શ્રી જૈન સત્ય પ્રકાશ
[वर्ष "से जे इमे गामागारनगर जाब सनिवेसेसु मणुआ भवंति, पगइभद्दआ पगइउवसन्ता पगइतणुकोहमानमायालोमा मिउमद्दवसंपन्ना अल्लीणा विणीया अम्मापिओउ सस्सुसगा अम्मापत्ताण अणतिकमणिज्जवयणा अप्पिच्छा अपारंभा अप्पपरिग्गहा अप्पेणं आरंभेणं अप्पेणं आरंभसमारंभेणं वितिकप्पेमाणा बहुइं वासाई आउयं पालयंति पालिता कालमासे कालं किच्या अणुत्तरेसु वाणमंतरेसु देवत्ताए उववत्तारो भवंति तं चेव सव्वं णवरं ठिति चोदसवाससहस्साई ॥" -(उववाई सूत्र, प्रश्न ७)
इसका सारांश यह है कि गांव नगर आदि सन्निवेशोंमें रहनेवाले जो आदमी प्रकृति (स्वभाव) से ही भद्रक (परोपकारी) हैं, स्वभाव से ही उपशान्त हैं और स्वभाव से ही क्रोध मान माया और लोभ को प्रतनु (अल्प) किये हुये हैं, अहंकार रहित होकर गुरुके आश्रयमें रहते हैं, विनीत हैं, मातापिताकी बातको पालते हैं, मातापिता की सेवा शुश्रूषा करते हैं, अल्पारंभी अल्पपरिग्रही हैं, और अल्प आरंभ समारंभ से अपनी जीविकाको चलाते हैं, वे अनेक वर्षांतक अपनी आयुको पूरी करके कालके समय में मृत्युको पाकर वाणत्यंतर नामके देवलोकमें दे ता होते हैं, वहां वे चौदह हजार वर्षतक रहते हैं, शेष पूर्ववत् है । यह ऊपर के पाठ का अर्थ है।
___अब यहां उपर्युक्त पाठके भावार्थ से साफ साफ प्रगट होता है कि मातापिता और गुरुजनों की सेवा में पाप नहीं हैं बल्कि पुण्य है, क्योंकि क्रोध मान माया लोभ ये नरककी निशानी है, मगर अल्प क्रोध, मान, माया लोभ के होते हुये भी विनीत होकर जो मातापिता और गुरुजनोंकी सेवा करता है वह चौदह हजार वर्ष तक देवलोक (स्वर्ग) में रहता है अतः इस सूत्र से माता पिता की सेवा को पुण्य होने में और भी पुष्टि ही हुई। आश्चर्य तो इस बातका है कि भ्रमविध्वंसनकारने भिक्खुजीको विरुद्ध प्ररूपणाकी पुष्टि के लिये या अपने कपोलकल्पित कुमतकी स्थापना के लिये उववाई सूत्रको लिखकर उसके अर्थ का अनर्थ किया है। अथवा यों कहिये कि उपर्युक्त उववाई सूत्र के आशय को भ्रमविध्वंसनकारने भ्रमयुक्त हो कर अच्छी तरह नहीं समझा। इसी लिये तो मातापिता गुरु साधु सन्तोंकी सेवामें पाप बतला रहे हैं । इस लिये मिथ्यात्वयुक्त विवेकहीनोंके वचनोंको सज्जन पुरुष छोड़ देते हैं । विवेकहीन स्वार्थान्धों का वचन धर्महीन है और भवसागर में डुबोनेवाला है। मातापिताकी सेवा निःशंक होकर करनी चाहिये इसीमें बुद्धिमत्ता है, मनुष्यत्व है और धर्म है। ___सम्यग्ज्ञानदर्शनचारित्र धर्म है या श्रुत और चारित्र धर्म है अर्थात् मोक्ष साधक है, अर्थात् तिपाईरूप मोक्ष के सम्यग्ज्ञानदर्शनचारित्र तीनों पाये हैं, अथवा यों कहिये कि गाड़ीरूप मोक्ष के श्रुत और चारित्र ये दोनों पहिये हैं। धर्मकी विशद व्याख्यामें औदार्य
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