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શ્રી જૈન સત્ય પ્રકાશ
[ वर्ष ११
अर्थात् कोई दिनरात मातापिताकी सेवा करे, उन्हें मन मानो वस्तु खिलावे, कावड में बिठाकर उनको कन्धे पर लिये फिरे, दोनों समय उन्हें स्नान करावे तो ये सब संसार बढानेवाले उपकार हैं अर्थात् मातापिता गुरुजन आदिकी सेवा करना पाप है, यह है जंगमयुगप्रधान कहे जानेवाले भट्टनायक तेरह पंथमत के जन्मदाताका सैद्धान्तिक विचार, मगर मेरे ख्यालसे इनकी ये उक्तियां मिथ्यात्वसूचक और दुर्बोधतापूर्ण हैं, क्योंकि विश्व के सभी सभ्य समाज इसी बात को स्वीकार करती हैं और मुझे भी प्रसंगवश उपदेशमें कहना है किपड़ता
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माता मित्रं पिता चेति स्वभावात्त्रितयं हितम् । कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धयः ॥ "
अर्थात् माता, पिता और मित्र ये तीनों स्वभाव से ही हित हैं और इनके अतिरिक्त तो कार्य-कारण के वश से ही हित होते हैं। यहां माता पिता और मित्रको स्वाभाविहित बुद्धि कहा है यानी माता पिताकी सेवा सुश्रूषा मित्रके साथ मैत्रीय - आचरण हित है - कल्याणकारक है धर्मरूप है । वास्तवमें माता पिता गुरुजनकी सेवा परम कर्त्तव्य है, और माता, पिता गुरुजनों की सेवा नहीं करनेवाले- उनकी निन्दा करने वाले कृतघ्न हैं, पापी हैं और साक्षात् नरपशु हैं ।
तत्त्वदर्शी आचारनिष्ठ अनेक ऋषियोंने तो अपने धर्मग्रन्थोंमें यथास्थान साक्षात् उपास्य देव माता पिता और गुरुको ही कहा है, जैसे
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पिता स्वर्गः पिता धर्मः पिता हि परमं तपः । पितरि प्रीतिमापन्ने प्रियन्ते सर्व देवताः ॥
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अर्थात् निरतिशय सुखदायक होनेसे पिता ही स्वर्ग है, पिता ही धर्म है और पिता ही है; पिता प्रसन्न होने पर सभी देव प्रसन्न होते हैं ।
माता कितनी पूजनीय है इस बातको संक्षिप्त रूपमें एक कवि कहते हैं किजननी जन्मभूमेश्च स्वर्गादपि गरीयसी
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अर्थात् जननी -- जन्म देनेवाली (माता), जन्मभूमि से और स्वर्ग से भी कहीं अधिक बड़ी है । यहां माताको जन्मभूमिसे और स्वर्ग से भी बहुत बड़ी कहा है । जन्मभूमि कितनी पूजनीया है यह सभी इतिहासप्रेमी जानते हैं और आज भी अपनी जन्मभूमि की स्वतंत्रता के लिये ही जवाहर जैसे भारतके लाल, राजेन्द्र जैसे भारत के रत्न, और गांधी जैसे भारतभूमिकी विभूति सब कुछ करने को सहने को तैयार हैं तथा कितने ही मातृभूमि भक्त मातृभूमि की सतत निश्चल सेवामें अपने प्राणोंको समर्पण कर अपने बना गये तथा अनेकों बना रहे हैं। यह है मातृभूमि की वन्दनीयता का दृष्टान्त, मगर जननी मातृभूमि से भी अधिक पूजनीय है, क्योंकि किसी भूमि पर या पराघीन जन्मभूमि पर अधिकार करना मनुष्य का एक पुरुषार्थ है, किन्तु उस पुरुषार्थकारी
नाम को अमर
एक सामान्य
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