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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir [388] શ્રી જૈન સત્ય પ્રકાશ [१५७ . . . . .. . . . . . . . . . ९९४में आबूके पास टेली गांधकी सीमामें श्रीसर्वदेवमूरिजी आदि ८ आचायोको आचार्य पद दिया तबसे बडगच्छ हुआ, उन में श्रीसर्वदेवसूरिनी बडे थे अतः वे ३५थे पट्टधर हुए (गुर्वावलि प्रलोक ४५से ६१ तक)-यह जो कुछ लिखा है (यह संक्षिप्त रूपसे क्रियारत्नसमुच्चयकी प्रशस्ति प्रलोक१८से २१ तक में भी है) यदि सत्य है तो ये देवसूरि पट्टधर और रत्नचूडकथाके प्रथम देवसरि अधिक संभव है कि दोनों एक हो । अश्वा श्रीउद्योतनसरिके पट्टधर जो सर्वदेवसरि हुए उन्हींका संक्षिप्तरूसे देवसरि नाम इस कथामें दिया हो, या आठ आचार्यों मेंसे एकका नाम देवसूरि हो तो भी कुछ कहा नहीं जा सकता । किन्तु इसमें एक आपत्ति यह है कि श्रीकुलमंटनसूरिरचित सं. १४४३के 'विचारअमृतसंग्रह' नामक ग्रन्थमें-जिसका अवतरण प्रसिद्ध पूज्य श्रीमद्विजयानन्दसूरिनीने अपने पत्रमें उद्धृत किया है ( देखो न्यायाम्भोनिधि भीषिनयानंदम्ररि चरित्र, पृ० ८३ ले० श्रीयुत सुशील) केवल एक आचार्य श्रीसर्वदेवसरिको ही वडकी छायामें आचार्य पद देने से वडगच्छ हुआ उल्लेख किया है तो इस ग्रन्थके अन्याय उल्लेखोंकी ऐतिहासिकताके विषयमें विचार करलेना योग्य है क्योंकि मेरे पास यह प्रन्थ नहीं है)। यदि ऐतिहासिक दृष्टिसे सं. ९९४से भी पहिले वडगच्छ हुआ सिद्ध होता तो श्रीयुत नाहरनीके जैन लेख संग्रह खण्ड२ ले० १७०९में सं. ९३७का श्रीउपोतनमरिनीका एक प्राचीनतम लेख उपलब्ध है तो उक्त समयमें भी एक उपोतनसरि हुए थे यह निःसन्देह है। अब केवल एक बात और शेष रह जाती है कि रत्नचूडकथाकी प्रशस्तिसे श्रीमुनिसुंदरगणि आदिकी गुर्वावलीमें भिन्न पट्टपरंपरा क्यों उपलब्ध है ? तो उसका तो यह समाधान है कि बहुधा ग्रन्थकार खास अपने पूर्वजोंका ही वर्णन देते हैं वडगच्छकी उद्धृत प्रशस्तियोंसे यह प्रमाणित है कि उस समयमें इस गच्छमें अनेक आचार्य हुए थे जबकि पट्टावली लेखकोंने यह ग्रहण न करके मुख्य परम्पराका उलेख किया होना संभाव्य है । किन्तु यह हो सकता है कि उनको घडगच्छकी उत्पत्तिका प्रामाणिक संवत् उपलब्ध न होनेसे ननश्रुतिके अनुसार वह लिख दिया हो । अतः अभ्याम्य तत्कालीन रचनाओं और शिलालेखों आदिमे किन किन आचायोंके नाम और परम्पराओंका उल्लेख है वह प्रकाशित करना इतिहासज्ञों एवं जिनके पास साहित्यके भंडारके भंडार पडे है उनका एवं जिनके पास वडगच्छकी प्राचीनतम पट्टावलियां उपलब्ध हों उनका कर्तव्य है इस प्रार्थनाके साथ मैं यह लेख समाप्त करता हूं। टिप्पनी-श्रीनेमिचंद्रसूरिकी प्रशस्तियों ही से यह साफ प्रकट है कि उनमें किसी प्रशस्तिमें अमुक नाम है जब कि दूसरियोंमें नहीं है, एवं इनमें पहिले श्रीउद्योतनरिका जो श्रमणगुणकी दुबह धुराको धारणकरनेवाले--विशेषण उल्लेख किया है उससे प्रकट है कि ये उद्योतनसरि त्यागी थे एवं उनके पूर्वज भी त्यागी थे। पता-कटरा खुशालराय, दहेली For Private And Personal Use Only
SR No.521576
Book TitleJain_Satyaprakash 1942 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJaindharm Satyaprakash Samiti - Ahmedabad
PublisherJaindharm Satyaprakash Samiti Ahmedabad
Publication Year1942
Total Pages46
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Jain Satyaprakash, & India
File Size22 MB
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