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पर जिनसेनाचार्य जी के पास जाकर अपने शासनकार्य में मार्गदर्शन पाते थे। यह विषय 'संजान ताम्रपट-शासन' से मालूम होता है।" जिनसेनाचार्य जी द्वारा रचित 'पार्वाभ्युदय' नामक काव्य से पता चलता है कि वे अमोघवर्ष के गुरु थे।
इति विरचितमेतत्काव्यमावेष्ट्य मेघं । बहुगुणमपदोषं कालिदासस्य काव्यं ।। मलिनित-परकाव्यं तिष्टतादाशशांक। भुवनमवतु देवस्सर्वदामोघवर्षः ।।
कालिदास के 'मेघदूत' काव्य के आधार पर रचित माधुर्य आदि अनेक गुणों से युक्त दोषरहित यह काव्य अचंद्रार्क अन्य काव्यों को गौण करके सर्वोत्कृष्ट रहे। राजा अमोघवर्ष सदा पृथ्वी की रक्षा करते रहें। इस पद्य से और गुणभद्राचार्यजी के उत्तर पुराण' का- यस्य प्रांशुनखांशु-जाल-विसरद्धारांतराविर्भव
त्पादाम्भोजरज: पिशंग-मुकुट-प्रत्यग्ररत्नद्युतिः ।।
सरिस्मर्ता स्वममोघवर्षनपति: पूतोहमद्येत्यलम् । ___ स श्रीमान् जिनसेनपूज्य-भगवत्पादो जगन्मंगलम् ।। जिसके उन्नत-नाखूनों की किरणों से फैलते हुए प्रकाश की धाराओं से आविर्भावित चरणकमल की धूलि से राजा अमोघवर्ष का मुकुट पवित्र माना जाता है। तथा जिनसेनाचार्यजी के दर्शन से आज का दिन पवित्र बन गया।" - अजितसेनाचार्यजी की तरह गुणभद्राचार्यजी ने अपने 'उत्तरपुराण' में अपने शिष्य राष्ट्रकूट के अकालवर्ष (द्वितीय कृष्ण) और चल्लकेतन घराने के लोकादित्य के शासन के समय में अपने पुराण-ग्रंथ की रचना पूर्ण होने के बारे में लिखा है। ___ लगभग ई.स. दसवीं सदी में अजितसेनाचार्यजी द्वारा जो गुरुकुल प्रारंभ हुआ, वह अनेक धर्मवीर, दानवीरों का एक विश्वविद्यालय हो गया था। इस गुरुकुल में ही कविचक्रवर्ती रन (ई.सा. सन्. 993) ने अजितसेनाचार्य जी के शिष्य होकर अपने विद्याभ्यास पाने का विषय 'अजितपुराण' में लिखा है। श्रवणबेळगोळ के विंध्यगिरि पर्वत पर शोभायमान गोम्मटेश्वर की महामूर्ति के निर्माता चावंडरायजी (ई.स. 978) अजितसेनाचार्यजी के दर्शन के लिए बंकापुर' आया करते थे। आपने अपने त्रिशष्टिलक्षण महापुराण' में (ई.स. 978) अजितसेनाचार्यजी की स्तुति करते आपको 'भवगुरु' कहा है। आपकी तरह आपके पुत्र जिनदेव भी अजितसेनाचार्य के पुत्र थे।" बंकापुर के मुनिसंघाधिपति सद्गुणों के खान सिद्धांत और आगमविशारद, सम्यग्ज्ञान-गुणान्वित देवेंद्रमुनीजी को
बंकापुर मुनींद्रोऽभूदेवेंद्रोरुंद सद्गुण सिद्धांता द्यागमाय॑ज्ञो
स ज्ञानादि गुणान्वित कहकर श्रवणबेळगोळ का एक कन्नड़-शिलालेख परिचय कराता है। गंगवंशभूषण मारसिंह जी ने एक वर्ष पहले ही सिंहासन छोड़कर
प्राकृतविद्या-जनवरी-जून '2003 (संयुक्तांक)
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