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9. अघोषसंज्ञा कातन्त्र– “वर्गाणां प्रथमद्वितीया: शषसाश्चाघोषा:" – (1/1/11)। पाँच वर्गों के प्रथम-द्वितीय वर्ण तथा 'श-ष-स' इन 13 वर्गों की 'अघोष' संज्ञा होती है। क, ख । च, छ। ट, ठ। त, थ। प. फ। श, ष, स' । . कच्चायन– “परसमञा पयोगे" - (1/1/9)। इसके अनुसार 11 वर्ण अघोषसंज्ञक सिद्ध होते हैं- 'क, ख। च, छ। ट, ठ। त, थ। प, फ। श, ष, स'।
- समीक्षा- जिन वर्णो के उच्चारण की ध्वनि अल्परूप में ही सुनाई पड़ती है, उन्हें 'अघोष' कहते हैं- 'न विद्यते घोषो। येषां ते अघोषा:' । शिक्षाग्रन्थों में इसे 'बाह्य-प्रयत्न' के रूप में स्वीकार किया गया है। याज्ञवल्क्यशिक्षा' आदि में भी यह संज्ञा उपलब्ध है। पाणिनि ने इन वर्गों के लिए 'खर्' प्रत्याहार का प्रयोग किया है।
10. व्यंजन का स्वर से संयोजन (परिभाषा) कातन्त्र- “व्यञ्जनमस्वरं परं वर्णं नयेत्” –(1/1/21) । स्वर और व्यञ्जन वर्णो में से किसको किसके साथ सम्बद्ध किया जाना चाहिए— इस सन्देह का समाधान इसमें किया गया है। तदनुसार व्यञ्जन वर्णों को ही परवर्ती वर्ण से सम्बद्ध किया जाना चाहिए।
कच्चायन– “नये परं युत्ते” –(1/1/11)। स्वररहित व्यञ्जन परवर्ती-वर्ण से युक्त होता है। इसके अनुसार अनुस्वार का परनयन नहीं होता- 'अक्कोच्छि में ये निग्गहीत'।
समीक्षा– वस्तुत: व्यञ्जन वर्ण पश्चाद्वर्ती होने के कारण परतन्त्र होते हैं, अत: इस परिभाषा की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती. फिर भी इसका सुखार्थ या स्वरूपाख्यानपरक निर्देश किया गया है।
11. वर्णवियोजन-परिभाषा कातन्त्र– “अनतिक्रमयन् विश्लेषयेत्” –(1/1/22)। सम्मिलित वर्गों का विश्लेषण विना ही अतिक्रमण किए अर्थात् क्रमबद्ध-रूप में करना चाहिए। जैसे—'वैयाकरण:, उच्चकैः' इत्यादि शब्दों में।
कच्चायन– “पुब्बमधोठितमस्सरं सरेन वियोजये” – (I/1/10)। पूर्वोच्चरित अस्वर अर्थात् व्यञ्जन वर्ण को स्वर से क्रमबद्ध-रूप में ही पृथक् करना चाहिए।
समीक्षा— लोकव्यवहार में मान्य इस अर्थ का निर्देश सूत्र द्वारा किया गया है। 'वैयाकरण' शब्द का पूर्वरूप व्+याकरण' माना जाता है। 'ऐ' का आगम बाद में होता है, परन्तु इस परिभाषा के अनुसार 'व्' के बाद इसका उच्चारण किया जाता है। पाणिनि ने इस लोकप्रसिद्ध अर्थ को बताने के लिए सूत्र बनाना आवश्यक नहीं समझा।
___12. लोकव्यवहार पर आधारित शब्दसिद्धि की प्रामाणिकता कातन्त्र- “लोकोपचाराद् ग्रहणसिद्धिः” –(1/1/23)। जिन शब्दों की सिद्धि
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प्राकृतविद्या अक्तूबर-दिसम्बर '2002