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________________ मूल्य : प्रथम भाग 100/-, (पैपरबेक, पृष्ठ 246) द्वितीय भाग 80/-, (पैपरबेक, पृष्ठ 96) प्राकृतभाषा के स्वाध्यायी जिज्ञासुओं के लिए यह प्रकाशन निश्चितरूप से उपयोगी हैं। इसमें अध्यवसायी विद्वान् डॉ. कमलचंद जी सोगाणी की अपनी विशिष्ट दृष्टि और कार्यशैली प्रतिबिम्बित है। यद्यपि प्राकृतभाषा के मूलभूत नियमों की इसमें कहीं-कहीं अनदेखी भी हुई है, यथा— पद के मध्य में हलन्त नकार का प्रयोग होना, प्राकृत के अनुरूप नहीं है। ऐसे स्थलों में अनुस्वार का प्रयोग होना चाहिए था, किन्तु प्रतीत होता है कि प्रत्ययों को दर्शाने के लिए ऐसी असावधानियाँ कुछ हो गई हैं। समग्रतः प्राकृतभाषा के व्याकरणिक नियमों की सूत्रानुसारी जानकारी के लिए यह संस्करण उपयोगी है, और संग्रहणीय भी है । -सम्पादक ** (3) पुस्तक का नाम: मदनजुद्ध काव्य मूल-लेखक : महाकवि बूचराज सम्पादन- अनुवाद : डॉ. (श्रीमती) विद्यावती जैन प्रकाशक संस्करण मूल्य 00 98 भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत् परिषद् : : प्रथम 1998 ई. : उपलब्ध नहीं, पैपरबेक, पृष्ठ 124 अपभ्रंश भाषा प्राकृत एवं हिन्दी के बीच की तह महनीय कड़ी है, जो आधुनिक राष्ट्रभाषा को हमारी प्राच्य - भाषाओं से जोड़ती है, और भारत की भाषिक एवं सांस्कृतिक एकता को निर्धारित करती है । अपभ्रंश भाषा के साहित्यकारों में जैन संतों और विद्वानों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है । यहाँ तक कि अपभ्रंश भाषा का अधिकांश साहित्य इन्हीं के द्वारा लिखा गया है । 12-13वीं शताब्दी ई. के यशस्वी साहित्यकार महाकवि बूचराज ने लगभग 8 रचनाएँ तथा अनेकों गीत और पद लिखे हैं । इनमें 'मयणजुद्ध कव्व' (मदनयुद्ध काव्य) नामक कृति अपने साहित्यिक गौरव के कारण विद्वज्जगत् में प्रभूत आदरणीय रही है 1 I विभिन्न ग्रंथ-भण्डारों से इसकी पाण्डुलिपियों का संकलन करके विदुषी सम्पादिका ने भरपूर परिश्रमपूर्वक़ इसका सम्पादन एवं अनुवाद किया है। जैनसमाज में प्राचीन पाण्डुलिपियों के सम्पादक और अनुवादक विद्वान् बहुत कम रह गये हैं, और नई पीढ़ी में यह विधा प्रायः अनुपलब्ध है। इस दृष्टि से विदुषी सम्पादिका का यह कार्य नितान्त आदरणीय, सराहनीय एवं अनुकरणीय है । यह पुस्तक प्रत्येक जैन श्रावक-श्राविका एवं विद्यानुरागीजनों के लिए अपने निजी संग्रह में रखने योग्य तथा पठनीय एवं विचारणीय है । - सम्पादक ** प्राकृतविद्या+अक्तूबर-दिसम्बर 2002
SR No.521369
Book TitlePrakrit Vidya 2002 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajaram Jain, Sudip Jain
PublisherKundkund Bharti Trust
Publication Year2002
Total Pages116
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Prakrit Vidya, & India
File Size14 MB
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