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________________ विचारणीय है कि बौद्धधर्म तो केरल से सातवीं और नौवीं सदी के बीच ही लुप्त हो गया था। जो भी हो, इस इतिहास के कुछ अंश इसप्रकार हैं, “जैन-बौद्धधर्मों के प्राबल्य के साथ केरल में आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को पुष्टि मिली।" जैन-बौद्ध-सन्यासियों ने नानाप्रकार के शास्त्र-ग्रंथों का केरल में प्रचार किया । कुंजिकुट्टन - तंपूरान अपने 'केरलम् काव्य' के द्वितीय सर्ग में लिखते हैं, “बौद्ध- जैनियों ने अपने योग-बल से अनेक सिद्धियाँ प्राप्त की थीं और अपने वैद्यक-ज्योतिष आदि शास्त्रों से संबंधित पुस्तकों की रचना की। केरल के ब्राह्मणों ने इनका परिचय जैन-बौद्ध ग्रंथों से प्राप्त किया था । " कुंजिकुट्टन - तंपूरान का यह मत गौर करने योग्य है कि “ मलयाली-ब्राह्मणों ने ज्योतिष, अमरकोष, ज्योतिर्गणित, आयुर्वेद आदि विद्याओं का ज्ञान जैनियों और बौद्धों से पाया था। इसलिए उनके प्रति केरली-ब्राह्मणों ने विरोध का प्रदर्शन नहीं किया; किंतु अनुनय -अनुरंजन के द्वारा उन्हें अपने वश में करने का प्रयत्न किया था।" तंपूरान का कहना है कि “तच्चों (तच्च-बढई) द्वारा प्रचार किया गया 'तच्चशास्त्र' (बढईगिरी का ग्रंथ), कणियान-जाति द्वारा प्रचारित ज्योतिष, वेलन-जाति द्वारा प्रचारित वैद्यकशास्त्र केरल में अतिप्राचीनकाल से चली आ रही परंपरा पर आधारित है ।" तंपूरान का समय उन्नीसवीं सदी का अंत और बीसवीं सदी का प्रारंभ है। इसलिए उनके मत के साथ बौद्धधर्म की संगति नहीं बैठती है। इन उल्लिखित विषयों की चर्चा इसी अध्याय में आगे की जायेगी । दाम्पत्य-संबंध पति-पत्नी-संबंध का आदर्श भी जैन - संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण देन केरल को है इस संबंध में उपर्युक्त 'केरलचरित्रम्' के पृ० 1098 पर यह मत व्यक्त किया गया है, “दाम्पत्य-संबंध में एकपत्नी और एकपतित्व का प्रारंभ कब से हुआ, इसके संबंध में कोई निश्चित - मत निर्धारित करना कठिन है। केरल में जैनधर्म के प्रभाव ने इस दिशा में अपना अंशदान किया होगा। 'शिलप्पादिकारम्' में वर्णित दाम्पत्य - लक्षण में ऐहिक सुखों से विरक्ति का जैनदर्शन परिलक्षित होता है, जिसमें दाम्पत्य-रति दैहिक न होकर आध्यात्मिक-स्तर पर वर्णित है। इस काव्य में स्पष्ट संकेत मिलता है कि स्त्री-पुरुष संयोग में लैंगिकता की अपेक्षा आत्मिक एवं दैवी - छाया का होना अधिक वांछनीय है।" यहाँ इतना ही उल्लेख किया जाता है 'शिलप्पादिकारम्' में जैन-श्राविका 'कण्णगी' और उसके प्रति 'कोवलन' की करुण कहानी है, जो कि आज भी केरल के जनमानस पर छाई हुई है। यह महाकाव्य चेरवंश के युवराजपाद इलंगो अडिकल की अमर कृति है। केरल को उस पर गर्व है। उसका अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इलंगो जैन साधु हो गए थे। उनका समय ईसा की दूसरी सदी है। अधिक विवरण एवं तथ्यों के लिए देखिए 'कोडंगल्लूर' नामक पुस्तक। - पुनर्जन्म का सिद्धांत अपने शुभ और अशुभ- -कर्मों के 00 72 अनुसार प्रत्येक प्राणी को तब तक जन्म और मरण प्राकृतविद्या�अक्तूबरर-दिसम्बर 2001
SR No.521367
Book TitlePrakrit Vidya 2001 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajaram Jain, Sudip Jain
PublisherKundkund Bharti Trust
Publication Year2001
Total Pages124
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Prakrit Vidya, & India
File Size15 MB
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