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शान्तिभाई आचार्य
शब्दकोशना उगम पूर्वे, आम, आवी शब्दावलिओथी प्रारंभ थयेलो देखाय छे ।
शब्द कोशना आपणा उपलब्ध साहित्य ने जोतां तेमां शब्दकोशना पर्यायवाची नीचेना अनूगो "शब्द"नी माथे जोवा मळे छ ।
शब्द-चिंतामणि.-आदर्श, आवलि-ली-ळी,-कोश के कोष,-प्रकाश,-रत्नमहो-दधिभण्डार,-संग्रह आ उपरांत ग्लोसरी अने डिक्षनेरी ए बे स्वतंत्र शब्दो पण आना पर्यायरूपे मळेछ।
आमाथा--आदर्श,-चितामणि,-प्रकाश अने--रत्नमहोदधि ए चारे संस्कृतनी सीधी असर तळेना छ अने संस्कृत के प्राकृत-अपभ्रंश भाषाओ संलग्न छे त्यां ज वपरायां छे । आ बधामा अलंकृत भाषा वडे शब्दकोशनो अर्थ अपायो छे ।
पडीधी-आवलि (-ली,ळी), -भण्डार अने -संग्रह मळे छे ते तथा – ग्लोसरी, ए बधाज आवलि (-श्री-टी) ना समानार्थी छे अने ऊपर "शब्दावलि" नी चर्चा करी छे तेमां समाई
बाकी रहेता वे पर्यायो ते-डिक्षनेरी अने कोश (कोष) छे । आ बनेने एक बीजाना पर्यायरूप गणावी शकाय । जे डिक्षनेरीमा अपेक्षित छे ते कोशमा . पण अपेक्षित रहे छे एम अमारु मानवूछ। एटले फलित ए थाय छे के गुजराती भाषामा “कोष" थी अंग्रेजी "डिक्षनेरी" नो अर्थ समजाय छे । आ डिक्षनेरी के कोशनो हवे वधारे विगते विचार करीए । .
कोशनो एक अर्थ भण्डार, खजानो एवो छ । आमां "शब्दकोश" शब्दसमूह “शब्दोनो खजानो" एका अर्थ आपे छ । शब्दनी व्याख्या बधी ज भाषाओमा एकसरखी होई शके नहीं । गुजरातीमा सामान्यरीते आपणे लेखनमां शब्दभेद लेखनरीति वडे दूर-नजीक लखीने करता हाईए छीए । उ. त. नवजीवन भेगुं लखोए तो एक शब्द अने छूटुं लखीए तो बे. आपणे हाल पुरती शब्दनी आ समजणने स्वीकारीने चालीशु. आथी शब्दकोश एटले शब्दोनो भंडार के खजानो एम अर्थ थशे ।
आ शब्दभंडारनी मर्यादा गुजराती भाषा पुरती होवाथी गुजराती साथे संलग्न खजानानीज अहीं बात करी छ ।
गुजराती शब्दकोशनां समग्र साहित्यने जोता संख्या दृष्टिए लगभग १५० जेटलां नानामोटा ग्रन्थ-पुस्तक-पुस्तिका-चोपानियां थवा जाय छ । आ बधामा केन्द्रस्थाने शब्द होवाथी आ संख्यामाथी जेनी स्वतंत्र पुस्तिकाओ न होय परंतु अन्य विषयनी साथे भागरूप शब्दो आवता होय तेबी पचीसेकनी संख्याने बाद करता बाकीनो सवासो जेटली संख्याने अहीं आवरी लेवानो प्रयत्न करवामां आव्यो छे । तेम छतां आ यादी संपूर्ण छे तेम अमे मानता नथी । परंतु आ बधांमा केन्द्रस्थाने शब्द होवाथी आ संख्याने "शब्दकोश' शीर्षक नीचे जरूर मूकी शकाय | परंतु आ बधा शब्दसंग्रहोंने जोवा तपासवा माटे आपणे कोईक व्यवस्था ऊभी करवी पडशे । अने आवी व्यवस्था ऊभी कर्या पछी आ ग्रंथोने ते संदर्भमा तपासवा अहीं धार्यु छे । . भाषा समस्तने आपणे जुदा जुदा हेतु माटे जुदा जुदा एकभोमां वहेंची नाखता होईए कीए । भाषाना आ रीते भिन्न भिन्न स्तरो पाडी शकाय । दा. त. ध्वनितंत्र, रूपतंत्र, वाक्य तंत्र बगेरे । आवा भिन्न भिन्न स्तरोमांथी कोईपण एक के विशेष स्तरोने छूटा पाडी