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________________ र.म. शाह मुणि निरइयार-चारित्तजुत्तु, इय भवह भावु जाणिउ निरुत्तु, विहरेइ महीयलि सारसत्तु । भो भक्यि कुणउ अप्पं पवित्तु ॥१२।। एवं संविहि, विहि-विखेविहिं, मुणि-सेणिअ उल्लाव-जुर । संबंधु सुअखिउ, जं किंचि वि लक्खिउ, महनिग्गंथज्ायण-सुउ ।।१३।२।। चारु-चउ-सरण-गमणो दाणाइ-सुधम्म-पत्त-पाहेओ । सीलंगरहारूढो जिणयह-पहिओ सया सुहिओ ॥१४॥ ॥ अनाथि-संधि समत्ता ॥ [२] जीवाणुसहि संधि जस्स पभावेणऽज्जवि तव-सिरि-समलंकिया जिया हुंति । सो निच्च पि अणग्धो संघो भट्टारगो जयइ ॥१॥ मोहारिहिं जगडिय, विसयहिं विनडिय, तिक्ख-दुक्ख-खंडियहं चिरु । संसार-विरत्तह, पसमिय-चित्तह, सत्तहं देमिऽणुसद्रि निरु ॥२॥ अणाइ निम्गोम-जंतूण मज्जंगओ, एगतणुऽणंतजंतूहिं सहसंगओ। समग्ग-उववाय-विणिवाय-ऊसासओ, समग्ग-आहार-नीहार-नीसासओ ॥३॥ तयणु ववहार-रासम्मि जिउ ओविओ, तम्मि रे जीव निच्चं पि नच्चाविओ । मुत्त पत्तेय-तरु-काय कम्मि हिरिभो, पुढवि अपु तेउ वाउऽणंतकाए ठिमो ॥४॥ भवि य नीराइ-सत्येहिं संताविओ, दुट्ठ-कम्मद-गंठीहिं संदाविओ । जीव खुड्डाग-मरणेण हा निहिओ, अहह एगंत-भवियव्वया-हिडिओ ॥५॥ सुहुम-कायाउ तउ बायरे चडिभो, तिक्ख-दुक्खेहिं लक्खेहि जिउ खडिओ। तत्थ अवसप्पिणुसप्पिणऽस्संखया, चउसु काएसु उस्सग्गओ अक्वया ॥६॥ कवणु तं दुक्खु जं जीव न हु पावियं, कम्म-परिणाम-भव-भाव-संभावियं । बेइंदि-तेइंदि-चउरिंदि-विगलिदिए, कालु संखेज्जओ कायठिइ निदिए ।।७।। भाव सब्वे वि सुह-असुह मुह वियसिया, सव्व जीवेहि हाऽणतया फरिसिया । नन्थि तं ठाणु लोए न जहिं हिंडिओ, राग-दोसाइ-सुहडेहिं हा दंडिओ ॥८॥ नरय-तिरियम्मि मणुअम्मि किह आणिओ, जणणि-जणयाइ-सयणेहिं संदाणिओ। इंदियग्गाम अभिराम मन्नंतओ, भीम-भव-रन्नि भमडंतु न य संतओ ॥९॥
SR No.520752
Book TitleSambodhi 1973 Vol 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDalsukh Malvania, H C Bhayani
PublisherL D Indology Ahmedabad
Publication Year1973
Total Pages417
LanguageEnglish, Sanskrit, Prakrit, Gujarati
ClassificationMagazine, India_Sambodhi, & India
File Size14 MB
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