________________
अनुसन्धान-७७
भट्टारकपुरन्दरभट्टारकश्रीहीरविजयसूरीश्वरपट्टालङ्कारहारभट्टारकभट्टारकश्रीविजयसेनसूरीन्द्रतत्पट्टपूर्वाचलसहस्रांशुसमानसम्प्रतिविजयमानभट्टारकश्रीविजयदेवसूरिगुरुभ्यो नमः ।
___ बार बोलनुं अर्थ लिखीय छइ । यथा - "फरुसवयणेण दिणतवं अहिक्खिवंतो हणइ मासतवं । वरिसतवं सवमाणो हणइ हणंतो अ सामन्नं ॥३४॥"
इत्युपदेशमालाद्वितीयशतके । एहनुं अर्थ लिखीय छइ । कठिन वचन बोलइ तेह- आखा दिवसनुं तप कीधु हुइ, ते फोक थाइ । तिरस्कार- वचन बोलइ तेहनु मसवाडा- तप फोक थाइ । शापर्नु वचन बोलइ तेनु वरस दिवस, तप फोक थाइ । जे क्रोधि करीनइं रचरस्ति पर प्रति हणइ-मारइ तेहy चारित्र फोक थाइ ॥१॥ तथा - "कुंभभित्तिशकलेन किल्बिषं बालकस्य जननी व्यपोहति । ओष्ठतालुरसनाभिरुष्टता दुर्जनेन जननी तिरोहिता ॥"
इति सूक्तावलीग्रन्थे ( )। एहनु अर्थ - माता बालकनी विष्टा बि ठीकरानइ पटंतरइ करीनइ ऊसारइ छइ पणि जे परन्नु अपवाद बोलइ छइ ते पोतानइ बेहु होठे तालुई जिह्वाइं करीनइ परना अवगुणरूप विष्टा ऊसारइ छइ । ते माटि विष्टानी ऊसारनार माताथी अधिक अपवादनु बोलनार ज्ञानवंति कहउ ।।२।। तथा - "तहेव काणं काणित्ति पि(पं)डगं पि(पं)डगत्ति वा । वाहिओ(अं) वा वि रोगित्ति तेणं चोरित्ति नो वए ॥"
इति दशवैकालिके (सप्तमाध्ययनम्-१२) एहनु अर्थ लिखीय छइ । काणानई काणो न कहीइ । नपुंसकनई नपुंसक न कहीइ । रोगिआनई रोगिओ न कहीइ । चोरनइ चोर न कहीइ ॥३॥
तथा - "देवे(वा) णं भंत(ते) ! संजय त्ति वत्तव्वं सिया? गोयमा ! णो यम(तिण)ढे समटे, अब्भक्खाणमेयं । [देवा णं भंते !] असंजय त्ति वत्तव्वं सिया? गोयमा ! णो यम(तिण)ढे समढे, निट्ठरवयणमेयं । [देवा णं भंते !
१. मासक्षमणर्नु ।