SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 84
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ७७ जान्युआरी- २०१९ वाउडि लगइ तो अग्गि, ना रे, ओ वा लोही चलइ, लोही चालइ तो नाग, नाग न, आगि न, नाव न, चकवी पिण म जोई, ए हीयाली अर्थ कहि, बूझई विरला कोई. [ ] पुरुष एक प्रचंड पाइ पांगुलो सिरि पखइ, पग चालइ पारकई आंखि-मुख अवरां आखइ, रुधिर-मंस-नह-रोम, अथ अंगुलीए ऊणो, जीयासं जडी जाइ, आप तसु न हुवइ अकूणो, घांटाथी छूटी लगइ, ग्रहे पुरुष ऊभो गलइ, सो सहि जक्ष-राक्षस नहि, कहइ क्षेम सो कुण नर लहइ. [ ] पंच चरण खट मेखल चरणो पांच नचावि पुठि कीय, तिण अवसरि इन्द्र आप पाघसो अनंत सुरापति दान दीय; मुंहि मंजार उरजि सो ईश्वर, काछि गुरु गंगेव(य) जिसो, पूरो पुत्र-कलत्र परिवारई, कहि ना ऐसो जोगी किसो. [ ] पढम अक्षर विणु ल-स माहिलु, बीय क्षर विणु पुप्फ पाछिलु, 'नहीं भलु' छु त्रीजि करी, चुथा विण भाषा आसुरी, च्यारि एकठा मेली जोई, ... ... ... ... ... ... ... [श्री नवकार] नारीए मली नर नीपायो, नर वली ऊंची डाले वलीयो, नर फीटी नरवाहण थयो, नारीनुं छंडी नेह, जाणवी होय तो जाणज्यो, जेहने दाडे पडी वेह. [ ] महीसुत कंठ वलुद्धओ, दधिसुतन आकार; कीसा(?) सुत दीठै मरे, पंडित करो विचार. [ ] एक नारी डूंगर वसै, बीजी नगर मझार; त्रीजी पखाणे नीपजी, चोथी नगर मझार; करण हीयाली पाठवी, राज भोज अवतार. [ ]
SR No.520578
Book TitleAnusandhan 2019 01 SrNo 76
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2019
Total Pages156
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy