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अनुसन्धान-७६
॥ ढाल ॥ भरतइ सुप्रसिद्धी वाणारसि पुर सार,
प्राणतथी चवि करि अवतरीयउ सुखकार; अससेण-कुलंबर-रजनीकर-सम गुण-ठाण,
पटराणी-वामा-उयरइ हंस-समान. २ पोस-पढम-पखि दसमि-दिनइ जनम्यउ प्रभु पास,
नील-वरण तनु सहतउ ओ पूरइ मन-आस; छपन कुमरि मिलि सूय-कम्म करि जिन-गुण गावइ,
मेरु-सिखरि सब इंद्र जइ जिननइ न्हवरावइ. ३
॥ दोहा ॥ पंच रूप करी निरखतउ, धारति प्रभु-सिरि छत्त; मात-पासि मूकी करी, निय निय ठामइ पत्त. ४
॥ ढाल ॥ कमठ कपट सठ तप तपइ ओ, तिहां पहुता प्रभु पास; जलता अहि-जुग देखि करि, काढि मंत्र दिय तास; पउमावइ धरणिंद पद, पामी पूरइ आस, पास तणी सेवा करइ अ, तिणि घरि लील-विलास. ५ अनुक्रमि जोवन पामि परणि प्रभावती, संसारिक-सुख अनुहवी ओ; तीस वरसनइ अंति अवसर जाणावइ, लोकंतिक सुरवर भवी अ; देइ संवच्छर-दान दीक्षा आदरी, पोस बहुल इग्यारसी ओ; संजमधर वरधीर अचल अकंपित,
सुरगिरिनी परि महरिसी ओ. ६ कमठ-असुर मेघमाली, वरसावइ घटा काली; जल आव्यउ नासा-नाली, धरणिंद-आसण चाली. ७ ततखिण धरणिंद पधारी रे, प्रभुनउ उवसग्ग निवारी; तिहां नृत्य करइ पउमावइ रे, मन-सुद्धइ जिन-गुण गावइ; विरहइ महियलि सामि, नव निधि प्रभुनइ नामि; ओ सेवइ सदा अ, तिणि सुख-संपदा ओ. ८