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अनुसन्धान- ७०
२. दो भ्रमज्ञानों में परस्पर भेद भी नहि हो पाएगा । क्यों कि निरालम्बन ज्ञानों में विषयव्यवस्था ही नहीं बन पाती । और उसके सिवा ज्ञानों में भेदक तत्त्व भी क्या हो सकता है ? ।
३. चार्वाक के मत से तो सुप्तावस्था और भ्रम दोनों में कुछ भी प्रतिभासित नहीं होता, तो दोनों अवस्थाओं में भेद क्या रहा ? |
वस्तुतः अख्यातिवाद के समर्थक चार्वाक भट्ट जयराशि का एकमात्र कार्य यह है कि दूसरे दार्शनिकों ने अपने अपने तर्कबल से जो कुछ सिद्ध समझ रखा है उसकी नितान्त असिद्धि उनको दिखलाना | दर्शनमात्र का प्रयोजन मिथ्या ज्ञान के नाश द्वारा मोक्ष प्राप्त करना है । यदि संसार से मिथ्याज्ञान का ही अस्तित्व मिट जाय तो दर्शन प्रयोजनहीन हो जाता है । अत एव दार्शनिकों द्वारा निरूपित मिथ्याज्ञान का भी खण्डन भट्ट जयराशि ने उचित समझा । उनका कहना है कि यदि मिथ्याज्ञान के विषय की व्यवस्था हो सके तो हम यह कह सकते हैं कि ज्ञान का आलम्बन अन्य है और प्रतीति किसी अन्य की हो रही है अत एव अमुक ज्ञान मिथ्या है । परन्तु जब वास्तव में ज्ञान के विषय की व्यवस्था ही नहीं बन पाती तब मिथ्याज्ञान का अस्तित्व कैसे सिद्ध होगा ? । इसलिए व्यभिचारी ज्ञान की सत्ता स्वीकृत नहीं की जा सकती ।
इस तरह से देंखे तो अख्याति का तात्पर्य भ्रमोत्पत्ति की कोई विशिष्ट प्रक्रिया या स्वरूप वर्णित करने में नहि, अपितु व्यावहारिक स्तर पर भ्रमज्ञान का अस्तित्व स्वीकृत करके भी दार्शनिक स्तर पर भ्रमज्ञान के उच्छेद में है । आगे बढकर भट्ट जयराशि ने तो ज्ञानमात्रं को निरालम्बन सिद्ध करने का प्रयास किया है, क्यों कि उन्हें दार्शनिकों को सम्मत 'प्रमाण के बल से प्रमेयव्यवस्था' को सिद्धान्त को तोडना था; पर 'प्रमेयकमलमार्तण्ड 'कार प्रभाचन्द्र जैसे दार्शनिकों ने उसका कडा प्रतीकार किया है । ५. वाचस्पति मिश्र व. की विविध असत्संसर्गख्यातियाँ
न्यायटीकाकार, वाचस्पति मिश्र आदि की दृष्टि में, देशान्तर में प्रसिद्ध रजतनिष्ठ रजतत्व का शुक्ति में जो अलीक समवाय सम्बन्ध है, उसका 'इदं