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________________ डिसेम्बर - २०१५ श्रीशाश्वतबिम्ब-स्तवन - सं. रसीला कडिआ वर्षो पूर्वे श्रीलक्ष्मणभाई भोजक (दादा)ए फुटकर पानांमांथी आ १ पत्र आपेल. जेमां ५० गाथा- 'श्रीशाश्वतबिम्ब-स्तवन' छे. - रचनाकारे शरूमां अतीत-अनागत-वर्तमान चोविशीना तीर्थङ्कर तथा विहरमान २० तीर्थङ्कर, नामस्मरण करी पछी उत्कृष्टा १७० तीर्थङ्कर परमात्माना उत्कृष्टा ९ क्रोड केवलज्ञानी अने ९ हजार क्रोड साधुने नमस्कार कर्या छे. त्यार पछी त्रण लोक (तिर्छालोक, पाताललोक अने ऊर्ध्वलोक)मां शाश्वता जिनचैत्य क्यां केटलां अने तेमां रहेल जिनबिम्बनी संख्या कहेवापूर्वक (विस्तारथी) नमस्कार कर्या छे. त्यार बाद अशाश्वत जैन तीर्थोना तीर्थपतिने नामपूर्वक नमस्कार करी स्तवन पूरुं कर्यु छे गा. ३८मां 'तिहु[अ]णकीर्ति इम विनवइ'मां कर्तानो उल्लेख होय एवं लागे छे. प्रस्तुत कृतिमां 'व'ना स्थाने 'ब'नो प्रयोग करेल छे, जे अहीं वाचनामां 'व' ज राख्यो छे. 'विचारि-विचारी' आ रीते क्यांक दीर्घ अने क्यांक ह्रस्व प्रयोग छे, जेने अहीं वाचनामां ह्रस्व प्रयोग करी दीधेल छे. गाथा बंधारणमां क्यांक अन्त्य प्रास नथी मलतो. एक श्लोक नम्बरनी गरबड छे जे यथातथ राखी ( )मां सुधारी लखेल छे. ___ पाछळ शाश्वता जिनचैत्य-जिनबिम्बनी संख्या- (अङ्कमां) परिशिष्ट तैयार करी मूकेल छे. पहिली पणमउं तिन्नि काल तीनइ चउवीसी [-]तीयानागत वर्तमान जिणनाह नमंसी - - [सास?]इं चेइय पढम संख्य संखेवि वखाणउं अवर - - [असास? ]तय भूमिपीठ तिह संख न जाणउं ॥१॥ केवलनाणी पढम जाणि निरवाणी सागर । नमउं महाजस विमलनाह गुणमणि वइरागर सर्वानुभूति श्रीधर दत्त तिहि दामोदर जिण स(सु)तेज सामी जिणंद मुनिसुव्रत सुंदर ॥२॥
SR No.520569
Book TitleAnusandhan 2015 12 SrNo 68
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2015
Total Pages147
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size1 MB
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