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________________ नवेम्बर - २०१४ २१३ २१४ अनुसन्धान-६५ वहे सरिता बहु नीरप्रवाहथी, डगले डगले रे जाण मनोहर, तस तटे शब्द दिई सारस भला, असत्ये सत्य प्रमाण मनोहर. ७ इण वर्णव करी वन तीहां शोभता, "गव्युति गव्युति रे गाम मनोहर तीहां नर-नारी वृंद वृंदे मिली, गाता प्रभुना रे नाम मनोहर. ८ ताल कंसाल मृदंग "वाजे करी, घुमर दीई रे नार मनोहर, कटी मेखल रणके वली घुघरी, झणके नेउर रे सार मनोहर. ९ "नकवेसर भालतीलक सिर राखडी, कंठे मुक्तिक रे माल मनोहर, अंग चंग "कुचफल देखी करी, रंभा दिई “ब(ब)भने रे गाल मनोहर. १० वली सीलगुणे करी सोभे नर नारी, वहे कुलवटनी रे रीत मनोहर, देव गुरु धर्म सदा हृदये धरे, छंडे व्यसन रे सात मनोहर. ११ धर नारिया केता व्यवहारिया, करता गमन रे बाह्य मनोहर, कीरियाणादिक वस्तु विक्रियता, धरता कमला रे म(स?)ध मनोहर. १२ ॥ दूहो । सोरठो ॥ वरणव जाण अपार, गुज्जर देश तणा सही, एक जीभ एक मुख, कहतां पार न पामीइं. १ ॥ छंद मत्तगयंद ॥ सप्त'भ' गणोपलक्षित ॥ अहमदावाद अछे अति सुंदर, सोहत लंक समान ही जानो, पुंस वडे भल नार कहावत, देख लजे गइ रंभ विमानो. २ रागरसे भर चातुर मोहत, काज करें अपनें सुभ ध्यानो, सूरि वसे चउमास सुधाकर, एह पखे परमोद वखानो. ३ ॥ अथ गुज्जरमध्ये राजनगर, तस्य वर्णनमाह गुर्जरवर्णनं कृत्वा ॥ दूहो: इम वरणव गुजरातनो, कीनो मन उलास, राजनगर हि[व] वर्णवू, द्यो सरसति प्रकाश. १ ॥ अथ मत्तगयंद छंद पूर्वेव ॥ अमुक नगरे इति परिभाषा ॥ देश आश्र(श्रित्य ।। राष्ट्र वडे बहु देख नरां पिण, गज्जर देशह मे जब पेख्यो, चावल खांण तणां बहु ओपत, बोलत वात हस्ये जब देख्यो, धारत अंग सु[व]र्ण अनोपम, अंबर २०थोव पसत्थ हि वेखो, लोक वसे परमोदरसे भर, भामहि २२अमद सहर अनोखो. १ ॥ इदं गौरवत्वं नगरस्य ॥ अथ नगरारामवर्णनं ॥ छंदजाति - त्रिभंगी। द्वात्रिंशत् स्वरोपलक्षितसरसर्ति मातं, जगत सुहातं, मनमां ध्यातं, सुखकर, यो वचनविलासं, मनउलासं. अहिमद तासं. किर्त्तिकरं. बहु नगरपसत्तं, अछे सुसत्तं, घाटनिमत्तं, ब्रह्मरचं, इह घट्ट सुघट्ट, भूतपगट्ट, गुज्जरपट्ट, मानसचं. १ गुज्जर..... तटनी तटपासं, कांप जु खासं, राजप्रकासं, अगरेज, जहां कटकह पूरं, जोध सनूर, वाजत नूरं, ध्वजनेणं, मयगल मदमत्तं, अश्वसु नत्तं, काबल जत्तं, सहसगम, बहु गोलानालं, वयरिसालं, एम नीहालं, अग्गेरमं. २ एम नीहालं..... दरीयासा पीरं, निरखह धीरं, जीर्ण मंदीरं, सब देखं, सेठ मगना बागं, पादप लागं, ताका थागं, कुण वेखं", हठीसिंघह कीधं, भुवनपसिद्धं, निरखत लिधं, प्रभुदारं, ध्वजसहित मंडाणं, उच्चेपमाणं, मेरुहराणं, जगसारं. ३ मेरु हराणं..... तिहां बाग विसालं, सोहे रसालं, प्रत्यख भालं, नाम कहं, कदली अरु अंबं, जंबु कदंब, ताड विलंब, देख रहं, नारंगी दाखं, दाडम चाखं, बद्रिवि आखं, निंबु मीठं, सीताफल सेवं, जांबल मेवं, लक्षां एवं, हम दिठं. ४ लक्षां एवं..... मालति फुनि दमणं, चंपक "पभणं, भमर जु भ्रमणं, अति गुंज, गुल मोगर वेलं, "मरुव चंपेलं, गुलाब खुलेलं, "नल-पुंजं, कोकिल सुक मोरं, करत हे सोरं, कूपकी कोरं, वह चडसं, बगला बहु चंगं, सोहे उमंगं, नरदिल-संगं, रंगरसं. ५ नरदिल.... कवी करि विचारं, "नरोड धारं, पास जेकारं, प्रासादं, मेरु सम जाणं, अछे मडाणं, स्त्री-नर आणं, पूय-पादं, फुनि कार्तिक मासं, पक्ष उजासं, पुनिम दिवसं, "पट्टबधं, तिह दर्श निमत्तं, मेल भरतं, स्नात्र करतं, भाववधं. ६ मात्र.. अव तटनी नीरं, वहते धीरं, जहां नर भीरं, स्नानकर, जल बहुत अथग्गं, निकलत मग्गं, नावकी सग्गं, पारपरं,
SR No.520566
Book TitleAnusandhan 2014 12 SrNo 65
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2014
Total Pages360
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size1 MB
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