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________________ जुलाई - २०१४ महकंत सोढ सूधांमसंद, चरचित्त गात पोहप सुगंध, स्तुति करत ताहि सुर नर सुरेस, मंगलसरूप नमी गनेस. ४ दोहा वर्णू अब छिब सहिरकी, जथा - जुक्त परमांन, वर्ण अढारै वसत है, कहियत ताहि बखांन. १ ॥ छंद-हाटक ॥ वसहै व्यवहारी, बहु अधिकारी, जसधारी धनवंत, सुकृत आचारी, दुकृत-निवारी, सुविचारी सतवंत, समकित - लयलीना, रंगरसभीना, ध्यावैं जिनवरध्यांन, एसों घांणोरा..... १४ हैं जनहितकारी, पर- उपगारी, सरल प्रणांमी संत, जिननों मुख जोता, प्रावित खोता, श्रोता नित सिद्धांत, प्रभुपय नित सेवै, लाहा लेवै, देवै दिल भल दांन, ऐसों घांणोरा..... १५ है चंपकवरणी, जनमनहरणी, तरुणी तरुण वेस, रम्यक गुणरक्ता, है पतिभक्ता, वक्ता अमृत वांण *, मिल मिल सह नारी, सझ शृंगारी, सारी ओढ सुचंग, जिनना गुण गावै, भावनं भावै, अधिकै मन - उछरंग, चालौं बाई जईई, पावन थई, भेट्या जिन जगभांण, ऐसों घांणोरा..... १७ ऐसों घांणोरा..... १६ घस केसर घोली, कनककचोली, चरचै जिनवरअंग, भरथार विशाला, मंगलिकमाला, अधिके भाव उमंग, बहु चूआ चोली, धूपसुं घोली, अगर उखेवैं आंन, ऐसों घांणोरा...... १८ * अत्रे ओक पङ्कि ओछी छे. Jain Education International For Personal & Private Use Only २२९ www.jainelibrary.org
SR No.520565
Book TitleAnusandhan 2014 08 SrNo 64
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2014
Total Pages298
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size4 MB
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