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जुलाई - २०१४ पंडित गुणमणी आगला जोय...., जीवणसागर गुरुराय मोरी...., तेह तणा सुपसायथी जोय...., चतुरसागर गुण गाय मोरी.... १०
॥ इति गुरु [भास] ॥ अथ विज्ञप्ती(प्ति) ॥
दूहा
सहू सावय सावी सदा, संघ सयल सुभ चिंत, गुरुवंदन भावे करी, भाखइ छइ धरि प्रीति. १ अत्र धरमकारज हुई, पूज्य तणे परसाद, पुण्य काज गुरु वलि, वर्ते सदा आह्लाद. २ तुम्ह तनु संयम तप तणा, सुभचिंतन हित पोष, कृपापत्र सेवक भणी, देई करो संतोष. ३ मठ माहे तापस वसे, विच दीजे 'जी'कार, अम्ह तुम्ह येसी प्रीत है, जाणत हे किरतार. ४ [मजीठ] आडा डुंगर वन घणा, विचि नदी वा(ना)ला असंख, किम [आवं] तुम वांदवा, देवे न दीधी पंख. ५ धरतीतल कागजं करूं, लेखन करुं वनराय, खीरसमुद्र खडीया करुं, मोपे लिखो न जाय. ६ प्रभुजी छे तुम गुण घणा, मोपे लिखो न जाय, सायरमे पाणी घणो, गागरमे न समाय. ७
तत्रत्य पं. श्रीरामविजयगणि, पं. विद्याविजैजी, पं. दांनविजैजी, पं. दौलतविजैजी, पं. माणिक्यविजैजी, पं. जीतसागरजी, पं. लालविजैजी, पं. फतेविजैजी, पं. रामविजैजी, प्रमुख श्रीजीना सपरिवारने वंदना १०८ वार कहसीजी । - अत्रत्य पं. जीवणसागर गणि, पं. तेजसागर गणि, पं. हिंमतसागर गणि, पं. चतुरसागर गणि, पं. भाणसागर गणि, पं. लालसागर गणि, पं. शिवसागर गणि, मु. बुधसागर गणि, मु. कृपासागर गणि, मु. लावण्यसागर गणि, मु. दयासागर गणि, मुनि जयसागर गणि, मु. भवानीसागर गणि, मु. जरुसागर गणि प्रमुख ठाणु २६ री वंदणा १०८ वार अवधारसी श्रीजी
॥ श्री रस्तु ॥ श्रीः ॥
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