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________________ १७८ अनुसन्धान-६४ दूहा इंम अनेक गुण सोहतो, देस सिरोही सिरदार, तिहां तिरथ अति दिपतो, आबूगीरी जग सार. १ आबूगिरि गिरिसेहरों, मोखप्रासाद-सोपांन, इंण वाटे वहेंता तिके, पोहोचे सिवपुरथांन. २ . आदि न कांइ इण गिरि तणी, तिम वली नावे अंत, सदाकाल ए सासतो, जिनवर एम कहत. ३ .. ए गिरि चिंतामणी जिस्यों, मनोवंछितनो गेह, नयणे परतिख निरखतां, गिरिपति अधिको एह. ४ अमरपति सहु आविया, भरतादि सवि राय, तिर्थंकर सब मूनिवरा, सेवित किय थिर थाय. ५ धन धन ए देशांतिलक, धन जन इहां बसंत, श्रीआबूगिरी नित प्रतें, निज नयणें निरखंत. ६ कांमधेनु जिम दोहिलो, पांमीजे कृतपूण्य, . तिम दरिसण ए गिरि तणो, जे पांमे ते धन्य. ७ ॥ अथ अबूंदवर्णनम् ॥ढाला। ॥ मिठि लागे रे तुमारी चाल छेहडो नाहि मेलुं - ऐ देशी ॥ आबूगीरी रलिआमणो रें, शिखर उन्नत असमान रें, चिहुं दिसि निझरणा झरे रें, नीरमल नीर प्रधान. १ अबूंदगिरि वारू रे, पर्वतमां मूगट समांन [ए आंचली] सिद्धगिरि जांणो तुहमे रें, शेव्रुजगिरिनो शृंग रें, प्रह समें उठि प्रणमिये रें, आंणी भाव अभंग. २ अबूंद० जोगीस्वर सूभ ध्यांनथी रें, अणसण लेई उदार रें, साधि पोहतां पंचमगति रे, तिण ए तिरथ सार. ३ अबूंद० पंडूकवन सम सारिखा रें, वन वाडि विस्तार रें, चंपक केतकी मालति रें, सोहे अति सहकार. ४ अबूंद० पातिक चूरे पाजें चढ्यां रे, गिरि फरस्यां गहगाट रें, देवल नयणे देखतां रें, अलगो जाइं उच्चाट. ५ अबूंद० Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520565
Book TitleAnusandhan 2014 08 SrNo 64
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2014
Total Pages298
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size4 MB
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