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निवेदन
'संशोधन'नो आधार अथवा पायो 'स्वाध्याय' छे, अने तेनी फलश्रुति 'स्वीकार' छे. स्वाध्याय एटले अध्ययन तेम ज अध्ययन करेल बाबतो विषे चिन्तन-परिशीलन. जेम जेम अध्ययन अने परिशीलन वधतां जाय तेम तेम ते तेजस्वी बनतां जाय. तेजस्वी अध्ययनना परिपाकरूपे थतुं संशोधन पण एटलुं ज तेजस्वी-मूल्यवान बनी रहे छे.
वस्तुतः संशोधन ए करवानी चीज नथी; करवा जेवी चीज तो छे अध्ययन. अध्ययन जो सशक्त - सघन हशे तो संशोधन करवुं नहि पडे, ए सहजपणे थतुं जशे; संशोधन माटे मथवुं नहि पडे, ए आपोआप स्फुरवा मांडशे. फलतः संशोधन स्वयं एक स्वाध्याय बनी रहेशे.
एक मजानुं उदाहरण टांकुं : अमदावादमां "आर्य भद्रबाहु अने मनुं निर्युक्तिसाहित्य'' विषे एक सेमिनार योजायेलो. डॉ. मधुसूदन ढांकी तेमां उपस्थित हता. वातवातमां तेमणे लुप्त के अज्ञात आगमग्रन्थो विषे कथन करतां कह्युं : “आजे जेने ध्यानशतकना नामे आपणे जाणीए छीए, ते 'झाणविभत्ती' नामे आजे लुप्त मनातुं आगम होय तो सम्भवित छे." आ विधान त्यां उपस्थित आचार्यादि सहुना मनमां एवुं तो वसी गयेलुं ! तो सतत स्वाध्याय करनारा अने निरन्तर खोजी मानस माटे आवा झबकारा थवा ए तद्दन सहज गणाय; आने आपणे 'संशोधन' सिवाय कया नामे ओळखी शकीए ?
संशोधननो अर्थ अत्यारे जराक एकाङ्गी थतो जतो होवानुं अनुभवाय छे. कोई अप्रगट कृति लेवी, तेनी २-४ नकलो पण मेळवी लेवी; पछी तेनी प्रतिलिपि करीने, महदंशे कोई पासे करावीने, तेनां पाठान्तरो मेळव्या के एक ग्रन्थ तैयार ! एनुं ज नाम संशोधन ! अत्यारे आ प्रकारनी संशोधन - प्रवृत्ति व्यापक बनी रही होवानुं जोवा मळे छे. प्राकृत भाषाओनी जाणकारी, पदच्छेद के वाक्यरचनानी समज, कठिन / नवा शब्दो विषे ऊहापोह, छन्दोनो अभ्यास,
आ बधुं तो क्यांक ज जरातरा जोवा मळे. सघन अभ्यास कर्या विना प्रतो मेळवीने संशोधक तरीके सिद्धप्रसिद्ध थवानो आथी वधु टूंको मार्ग कयो होय? अने पछी आवा संशोधको पूर्व सूरिओनां संशोधनो तथा मन्तव्यो/