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________________ डिसेम्बर २०११ (८) बाल- अविरत जीवोनुं मरण. (९) पण्डित- संयतजीवोनु मरण. (१०) मिश्र- श्रावको, मरण. (११) छद्मस्थ- केवलज्ञान नहीं प्राप्त करनारा जीवनुं मरण. (१२) केवलि- केवलज्ञानी महात्मानुं निर्वाण. (१३) गृध्रपृष्ठ- स्वेच्छाले पक्षीओना भक्ष्य बनीने मरवू. (१४) वैहायस- फांसो खाइने, भृगुपात व. द्वारा मरवू.' (१५-१७) भक्तपरिज्ञा, इंगिनी, पादपोपगमन - शास्त्रव्यावर्णित अनशनना त्रण प्रकारो स्वीकारीने मरवू. हवे युगलिक मनुष्य-तिर्यंचो (के जेओ अवश्य असंख्य वर्षना आयुष्यवाळा होय छे अने मरीने देवलोकमां ज जाय छे), देवो (मरीने देव के नारक न ज थाय) अने नारको (देवनी जेम) ने १७मांथी केटलां मरण सम्भवे ते जोईओ. आ जीवोनुं मृत्यु स्वाभाविक ज होय छे तेथी आ जीवोने गृध्रपृष्ठ के वैहायस तथा वशात मरण न होय. वळी आ जीवोने अनशन पण न होय, तेथी अन्तिम त्रण मरण पण न होय. आ जीवोने मरीने तेना ते ज भवमां उपजवानुं होतुं नथी, तेथी तद्भवमरण पण न होय. तेमज वलन्मरण अने अन्तःशल्यमरण पतितपरिणामी संयतने ज होय, पण्डित-मरण अने मिश्र-मरण अनुक्रमे संयमी जीवो अने श्रावकोने ज होय, तथा छद्मस्थमरण अने केवलिमरणनी विचारणा संयमीओने अनुलक्षीने ज थाय छे, तेथी आ बधां मरणो पण युगलिको, देवो अने नारकोने न होय. अने बालमरण जो के आ जीवोने सम्भवे छे पण पारमार्थिक रीते जोईओ तो बालमरण पण आ जीवोने न गणाय, केमके ज्यां विरतिनो सम्भव छे त्यां बाल, पण्डित अने मिश्रनी विचारणा थाय, परन्तु ज्यां सदा अविरति ज छे त्यां बाल-पण्डित ओवा भेदो पण न पडाय. तेथी आवीचि, अवधि अने आत्यन्तिक-मरणना आ त्रण ज भेदोनो युगलिको, देवो अने नारकोमा सम्भव छे. १. गृध्रपृष्ठ अने वैहायस - आ बे मरणोनी तेवां कारणोसर साधुने अनुज्ञा मळे छे.
SR No.520558
Book TitleAnusandhan 2011 12 SrNo 57
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2011
Total Pages135
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size1 MB
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