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________________ डिसेम्बर २००८ माहिती नवांप्रकाशनो १. कथारत्नसागर : कर्ता : मलधारगच्छीय श्रीनरचन्द्रसूरि; सं. आ. विजयमुनिचन्द्रसूरि; प्र. आचार्य ॐकारसूरि आराधना भवन, सूरत, सं. २०६४ प्राचीन ताडपत्रादि प्रतिओना आधारे थयेनु उपयुक्त सम्पादन. आजपर्यन्त आ ग्रन्थ अप्रकट हतो. १३ मा सैकानी एक सुन्दर रचना आपणने आ पुस्तकरूपे उपलब्ध थाय छे, अने ते रीते एक मूल्यवान ग्रन्थनो उद्धार पण थयो छे. २. श्रीआचाराङ्गसूत्रम् (हिन्दी पद्यानुवाद) अनुवादक : स्व. आचार्यश्री विजयसुशीलसूरि; सं. आ. विजयजिनोत्तमसूरि; प्र. सुशीलसाहित्य प्रकाशन समिति, जोधपुर; सं. २०६४ __ आचाराङ्गसूत्रना प्रथम श्रुतस्कन्धनो दुहा छन्दमां हिन्दी भाषामां थयेल सरल पद्यानुवाद, बाल जीवोने पवित्र आगमसूत्रना गम्भीर भावोने समजवामां उपकारक नीवडे तेम छे. साहित्यसेवी अने सर्जक आचार्यश्रीनी सर्जक प्रतिभानो एक नवो अने मधुर उन्मेष आमां प्रगट थयो छे. केटलांक, विषयानुरूप, सुन्दर चित्रोथी ग्रन्थ विशेषे सुशोभित बन्यो छे. ३. षोडशकप्रकरण (सानुवाद), कर्ता : श्रीहरिभद्रसूरि; वृत्ति : श्रीयशोभद्रसूरि तथा उपाध्याय यशोविजयजी; अनुवाद : आ. मित्रानन्दसूरि. प्र. पद्मविजयजी गणि जैन ग्रन्थमाला ट्रस्ट, अमदावाद; सं. २०६१ मूलग्रन्थ अने तेनी बन्ने टीकाओनो सरल, बालजीवोने उपकारक अनुवाद. ४. सिद्धहेमचन्द्रशब्दानुशासन-व्याकरण-बृहद्वृत्ति ऊपर कोई विद्वान् मुनिराजे 'दुण्ढिका' टीकानी रचना करी छे. सम्भवतः १५मा के १६मा शतकनी ए रचनानुं हस्तप्रतिओ परथी सम्पादन मुनि विमलकीर्तिविजयजी करी रह्या छे. तेनो प्रथम विभाग प्रगट थई गयेल छे. व्याकरणना अभ्यासीओने उपयोगी ग्रन्थ. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520546
Book TitleAnusandhan 2008 12 SrNo 46
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2008
Total Pages106
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size6 MB
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