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अनुसन्धान ४५
अने करी रहेला विद्वानोना कार्यथी परिचित करनार लेखो आपवानु 'अनुसन्धाने' स्वीकार्यु छे ए एक समुचित-आवकार्य पगलुं छे. श्रीमती कोलेट काइयाए विविध फ्रेन्च विश्व विद्यालयोमां जैनधर्म अने संस्कृत-प्राकृत-अपभ्रंश आदि भाषाओना अध्यापनक्षेत्रे तथा संशोधनक्षेत्रे करेलुं कार्य विपुल कही शकाय एवं छे.
अनु० ४४मां श्री रत्नसिंहसूरिकृत चोत्रीस लघुकृतिओ प्रसिद्ध थई छे... सूरतना श्रीमोहनलालजी जैन उपाश्रयना ज्ञानभण्डारनी ताडपत्रीय प्रत, तेना परथी श्रीअगरचंदजी नाहटाए वर्षों पूर्वे ऊतारेली नकल, ए नोटबुक श्री मृगेन्द्रविजयजी महाराज पासे सचवाई, तेना परथी आ रचनाओ श्रीशीलचन्द्रसूरिए सम्पादित करी अनु०मां प्रगट करी ! ज्ञान आ रीते ज हस्तान्तरित थतुं आव्यु छे ने ?
प्रस्तुत रचनाओ वांचतां एक भावसभर - चिन्तनसभर कृतिओ वांच्यानो अनुभव थाय छे. कविना ऊर्मिप्रधान धर्मरंगी व्यक्तित्वनी जाणे के साक्षात् छबी आ लघुकृतिओमां तरवरी रहे छे- आंसुनो उल्लेख आमां वारंवार थयो छे.
आ समुच्चयनी केटलीक कृतिओ वर्षों पूर्वे प्रताकारे छपाई छे, एमांनी एक रचना 'मनोनिग्रहभावनाकुलक' आ पंक्तिओना लेखकने खूब स्पर्शी गई हती अने एनो गुजराती भावानुवाद पण को हतो जे 'जब लग आवे नहीं मन ठाम' ए शीर्षक साथे 'दिलमां दीवो करो' नामक पुस्तिकामां प्रगट थयो छे. आ मधुर-मार्मिक-प्रेरक रचनाना कर्ता विशे 'अनुसन्धान' द्वारा आजे जाण्यु.
कविनी संस्कृत रचनाओ स-रस छे ज, तेम छतां प्राकृत-अपभ्रंश रचनाओमां कवि विशेष खील्या जणाय छे. सम्पादकश्रीए कर्ता अने कृति विषयक पूरक नोंध अने इतिहासपरक विवरण आप्यां छे अने ए रीते आ विशिष्ट रचनाने पर्याप्त न्याय आप्यो छेः पाठसंशोधन पण थयुं छे, छतां थोडा शुद्धिस्थान जोवामां आव्या छे. तेनी तालिका
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